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Friday, November 3, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 6) : तुंगनाथ जी मंदिर

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 6) : तुंगनाथ जी मंदिर





तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में हम आपको तुंगनाथ मंदिर ले चलते हैं। तुंगनाथ का स्थान पंच केदारों में से तीसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर केदारनाथ मंदिर जो द्वादश ज्योतिर्लिगों मे से एक है। द्वितीय केदार के रूप में भगवान मदमहेश्वर की पूजा की जाती है। तुंगनाथ मंदिर तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है। चतुर्थ और पंचम केदार क्रमशः रुद्रनाथ और कल्पेवश्वर को माना जाता है। तुंगनाथ जी का मंदिर समुद्र तल से लगभग 3680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर कई पौराणिक तथ्यों को अपने आप में समेटे हुए है। कथाओं के आधार पर यह माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था। मंदिर का इतिहास हजारों साल पूर्व का रहा है। यहीं मंदिर से कुछ ऊपर एक चंद्रशिला नामक चोटी है जिसके बारे में कहा जाता है कि राम ने रावण का वध करने के पश्चात ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए कुछ दिन तक इस चोटी पर तपस्या की थी और तभी से इस स्थान का नाम चंद्रशिला पड़ गया। यह मंदिर केदारनाथ और बदरीनाथ मंदिर के लगभग बीच में स्थित है। यह गढ़वाल के सुंदर स्थानों में से एक है। जनवरी से मार्च तक मंदिर पूरी तरह से बर्फ में डूबा हुआ होता है। बरसात के मौसम में दूर दूर तक हरियाली ही हरियाली दिखती है। तुंगनाथ तक पहुंचने के लिए चोपता से तुंगनाथ तक की तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई का रास्ता पैदल ही तय करना पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ के पैदल मार्ग को हर जगह 3 किलोमीटर ही लिखा गया है पर मुझे ये दूरी 3 किलोमीटर से ज्यादा प्रतीत होती है। अब चाहे दूरी जितनी हो जिनको जाना है वो चाहे कितनी भी दूरी वो तो जाएंगे ही।

Wednesday, November 1, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 4) : कालीपीठ, उखीमठ

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 4) : कालीपीठ, उखीमठ



तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले चलते हैं उस स्थान पर जिसका संबंध शिव और शक्ति दोनों से है और उस पवित्र स्थान का नाम है कालीमठ। कालीमठ रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड) जिले का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह गुप्तकाशी और उखीमठ के बीच सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित है। इसे भारत के सिद्ध पीठों में एक माना जाता है। कालीमठ में देवी काली का एक बहुत ही प्राचीन मंदिर है। कहा जाता है कि मां भगवती ने इस स्थान पर दैत्यों के संहार के लिए काली का रूप धारण किया था और उसी समय से इस स्थान पर भगवती के काली रूप की पूजा-अर्चना होती आ रही है। यहां देवी काली ने दुर्दान्त दैत्य रक्तबीज का संहार किया था, उसके बाद देवी इसी जगह पर अंतर्धान हो गई। कहा यह भी जाता है कि यही जगह प्रसिद्ध कवि कालीदास का साधना-स्थली भी थी। इसी जगह पर कालीदास ने मां काली को प्रसन्न करके विद्वता प्रदान की थी। यह स्थान धार्मिक दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण है साथ यहां प्रकृति का भी अलौकिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है। साल 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के दौरान कालीमठ में स्थित मां लक्ष्मी, शिव मंदिर, ब्रती बाबा समाधि स्थल, मंदिर समिति कार्यालय समेत स्थानीय लोगों के कई व्यापारिक प्रतिष्ठान आपदा की भेंट चढ़ गये थे। महालक्ष्मी मंदिर के टूटने के साथ ही मंदिर में रखी हुई पौराणिक पत्थर तथा धातु की मूर्तियों में से कई मूर्तियां सरस्वती नदी के उफान में बह गई। सरस्वती नदी के दीवार के साथ बनी रेलिंग पर भक्तों द्वारा बांधी गई घंटियां इसकी शोभा में चार चांद लगाने का काम करती है।

Monday, October 30, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 3) : काशी विश्वनाथ मंदिर, गुप्तकाशी

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 3) : काशी विश्वनाथ मंदिर, गुप्तकाशी



तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले चलते हैं गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के प्रसिद्ध और पुरातन मंदिर में जिसका संबंध महाभारत काल से ही है। गुप्तकाशी कस्बा केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव है। कहा जाता है कि पहले इसका नाम मण्डी था। जब पांडव भगवान् शंकर के दर्शन हेतु जा रहे थे तब इस स्थान पर शंकर भगवान् ने गुप्तवास किया था जिसके बाद पांडवों ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किया था। इस कारण इस स्थान का नाम गुप्तकाशी पड़ा। काशी विश्वनाथ के मंदिर में एक मणिकर्णिका नामक कुंड है जिसमे गंगा और यमुना नामक दो जलधाराएं बहती है। हमने भी अपनी तुंगनाथ यात्रा के दौरान इस मंदिर में महादेव के दर्शन किया तो आइए आप भी हमारे साथ इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करिए। कहा जाता है न कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। अगर कल शाम को बरसात न हुई होती तो शायद हम गुप्तकाशी न आकर उखीमठ ही चले जाते और उखीमठ जाते तो ये यात्रा केवल तुंगनाथ तक ही सीमित रह जाती और हम गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के दर्शन के से वंचित रह जाते वो भी श्रावण महीने के पूर्णिमा के दिन। मेरे सबसे पहले जागने और नहा-धो कर तैयार होने का मुझे एक फायदा यह मिला कि जब तक हमारे सभी साथी स्नान-ध्यान में लगे तब तक हम पहाड़ों की खूबसरती का दीदार करने के लिए गेस्ट हाउस की छत पर चला गया। यहां जाकर जो पहाड़ों में बरसात का जो नजारा दिखा वो कभी न भूलने वाले पलों में शामिल हो गया। बहुत लोगों को कहते सुना है कि बरसात में पहाड़ों की घुमक्कड़ी करने से बचना चाहिए और ये बात बहुत हद तक सही भी है। पर इस बरसात में यहां आकर हमने पहाड़ों का जो सौंदर्य देखा उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस तरह शादी में नई दुल्हन सजी संवरी होती है ठीक वैसे ही पहाड़ भी इस मौसम में एक दुल्हन की तरह दिख रही थी। बरसात के कारण मुरझाए पेड़ों पर हरियाली छाई हुई थी। पिछले साल जब जून के महीने में हम यहां आए तो यही पहाड़ सूना-सूना लग रहा था पर बरसात में इन पहाड़ों का मुझे एक अलग ही रूप देखने को मिला। एक तो हरा-भरा पहाड़ उसके ऊपर से अठखेलियां करते बादल का आना और जाना मन को मुग्ध कर रहा था।

Friday, September 22, 2017

त्रिवेंद्रम यात्रा : पद्मनाभस्वामी मंदिर और कोवलम बीच

त्रिवेंद्रम यात्रा : पद्मनाभस्वामी मंदिर और कोवलम बीच


आज हमारी यात्रा का आठवां दिन था और हमारी यात्रा अब धीरे धीरे अंतिम अवस्था में पहुंच रही थी। त्रिवेंद्रम से दिल्ली की हमारी ट्रेन दोपहर बाद 2ः15 बजे थी। तब तक पहले की बनी योजना के अनुसार आज पद्मनाभ स्वामी मंदिर में भगवान विष्णु के दर्शन करना और उसके बाद कोवलम बीच जाना था। उसके बाद वापसी में समय बचने पर गणपति मंदिर में गणपति जी के दर्शन करना था। तड़के सुबह 3 बजे अलार्म बजने के साथ ही नींद खुल गई। रात में 11 बजे के बाद तो सोए थे और 4 घंटे में नींद ठीक से पूरी हुई भी नहीं कि जागना पड़ रहा था। वैसे भी घुम्मकड़ी में नींद और भूख दोनों को त्यागना पड़ता है तभी घुमक्कड़ी हो सकती है। खैर जैसे तैसे आंखे मलते हुए उठे और दूसरे कमरे में सो रहे सभी लोगों को जगाया। यहां कमरा भी ऐसा मिला था कि हरेक व्यक्ति के लिए एक छोटा कमरा था और हम पांच लोगों के लिए पांच अलग अलग कमरे थे। हमारी योजना मंदिर 5 बजे से पहले पहुंचने की थी इसलिए सब जल्दी जल्दी नहा धो कर निकलने की तैयारी करने लगे। 4 बजते बजते हम लोग तैयार हो गए। सारा सामान पैक कर लिया गया कि आने के बाद ज्यादा समय न लगे और गीले कपड़े सूखने के लिए कमरे में ही डाल दिया गया। इतना सब करते करते 4ः15 बज गए। मंदिर जाने के लिए हम कमरे से निकले तो अभी बाहर बिल्कुल घना अंधेरा था। स्टेशन से बाहर आते ही हमें पद्मनाभ स्वामी मंदिर जाने के लिए केवल 50 रुपए में एक आॅटो मिल गया। आॅटो वाले से हमने मंदिर के मुख्य दरवाजे की तरफ छोड़ने का कहा। केवल 10 मिनट के सफर में हम मंदिर के पास पहुंच गए और आॅटो वाले को पैसे देकर हम मंदिर की तरफ बढ़ गए।

Friday, September 15, 2017

कन्याकुमारी यात्रा (भाग 2) : भगवती अम्मन मंदिर और विवेकानंद रॉक मेमोरियल

कन्याकुमारी यात्रा (भाग 2) :
भगवती अम्मन मंदिर और विवेकानंद रॉक मेमोरियल 




विवेकनन्द आश्रम में स्थित सनराइज व्यू पॉइंट से सूर्योदय का विस्मरणीय और मनमोहक नजारा देखने के बाद आइये अब हम चलते है भगवती अम्मन मदिर, विवेकानंद रॉक मेमोरियल और फिर उसके बाद कुछ और जगहों की सैर करेंगे। 8 बज चुके थे और हम अपने कमरे से निकलकर उस जगह पर आकर बस का इंतज़ार करने लगे जहाँ से आश्रम की बसें यहाँ आने वाले लोगों को लेकर संगम तक जाती है। बस आने का समय 9:30 बजे था और फिर यहाँ से जाने का समय 10:30 बजे था। 2 घंटे तक यहाँ बैठकर इतंजार करना तो ठीक बिलकुल भी नहीं था तो हमने ऑटो से जाना ही अच्छा समझा। अब सड़क पर होते तो कोई ऑटो बहुत आसानी से मिल जाती पर आश्रम के अंदर ऑटो तभी आती है जब वो किसी को यहाँ छोड़ने आया हो। कुछ मिनट के इंतज़ार के बाद भी जब कोई ऑटो नहीं आया तो हम पैदल ही चल पड़े। अभी कुछ ही कदम चले थे कि एक ऑटो आता हुआ दिखाई दिया जो कुछ लोगो को स्टेशन से लेकर यहाँ आया था। हमने उस ऑटो वाले को संगम तक छोड़ने को कहा तो उसने 5 आदमी का 50 रुपये  माँगा। हम भी ख़ुशी खुशी ऑटो बैठ गए और करीब 10 मिनट के सफर के बाद हम उस जगह पर पहुंच गए जहाँ से एक रास्ता मंदिर की तरफ और एक विवेकनन्द रॉक मेमोरियल की तरफ जाता है और किसी भी प्रकार की गाड़ी का यहाँ से आगे जाना निषेध है।

Friday, September 1, 2017

रामेश्वरम यात्रा (भाग 2): धनुषकोडि बीच और अन्य स्थल

रामेश्वरम यात्रा (भाग 2): धनुषकोडि बीच और अन्य स्थल



रामेश्वरम मंदिर में दर्शन के बाद आइये अब चलते हैं रामेश्वरम के अन्य दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करते हैं। मंदिर में दर्शन, पूजा-पाठ, कुछ शॉपिंग आदि करते-करते 10:30 बज चुके थे। लोगों से पूछने पर पता चला कि अन्य स्थानों पर जाने के लिए बस या ऑटो अग्नितीर्थम के पास ही मिलेंगे तो हम एक बार फिर से अग्नितीर्थम के पास आ गए। यहाँ कुछ ऑटो वाले खड़े थे जो रामेश्वरम घूमने के लिए लोगों से पूछ रहे थे। हमने कई ऑटो वाले से बात किया तो सबने सब जगह घुमाकर फिर से यहीं पर या रेलवे स्टेशन तक छोड़ने के लिए 500 रुपए की मांग की। पैसे तो वो ज्यादा नहीं मांग रहे थे पर समय 2 घंटे से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं थे, पर 2 घंटे में इतनी जगह घूम पाना बिल्कुल ही असंभव था। बहुत करने पर एक ऑटो वाला 2:30 घंटे समय देने के लिए तैयार हुआ पर इतना समय भी बिल्कुल अपर्याप्त था, लेकिन ऑटो वाले इस बात की गारंटी ले रहे थे कि इतने समय में सब पूरा हो जायेगा और यदि उनकी बात मानकर हम चले भी जाते हैं तो चेन्नई की तरह यहाँ भी लफड़ा होना निश्चित था। यही सब सोचकर मैंने बस से ही जाना उचित समझा और एक दुकान से पानी लिया और बातों बातों में उनसे बस के बारे में कुछ जानकारी ले लिया और चल पड़े बस स्टैंड के ओर।  

Friday, August 25, 2017

रामेश्वरम यात्रा (भाग 1) : ज्योतिर्लिंग दर्शन

रामेश्वरम यात्रा (भाग 1) : ज्योतिर्लिंग दर्शन 





आज से एक साल पहले जब हमने भारत के उत्तर में हिमालय पर स्थित केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन किये थे तो ये सोचा भी नहीं था कि एक साल बाद देश के सबसे दक्षिण में स्थित भगवान शंकर के एक और ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। रामेश्वरम महादेव के ज्योतिर्लिंग के साथ साथ भगवान् विष्णु के चार धामों में से एक धाम भी है। रामेश्वरम शहर के पूर्वी भाग में स्थित श्री रामनाथ स्वामी मंदिर की ऊंची ऊंची दीवारें, सुन्दर कलाकारी से सजे हुए स्तम्भों की श्रृंखलाएं, बुलंद और सजे धजे गोपुरम (मंदिर का प्रवेश द्वार) के साथ साथ विशालकाय नंदी को देखना किसी सुन्दर कल्पना के सच होने जैसा लगता है। मंदिर का खूबसूरत विशाल गलियारा जिसे एशिया में मौजूद हिन्दू मंदिरों में सबसे लम्बा गलियारा होने का दर्जा प्राप्त है। यहाँ दो शिवलिंग की पूजा होती है, एक वो जिन्हें हनुमान जी कैलाश से लेकर आये थे और उसे विश्वलिंगम कहा जाता है जबकि दूसरे को जिसे भगवान राम ने बनाया था जिसे रामलिंगम कहा जाता है। मन्दिर परिसर में 24 कुंड है, जिसमें से 2 कुंड सुख चुके हैं और 22 कुंडों में पानी है पर यहाँ आने वाले लोगों को 21 कुंड के पानी से ही स्नान कराया जाता है क्योंकि 22वें कुंड में सभी कुंडों का पानी है। कुछ लोग जो लोग इन सभी कुंडों में नहीं करना चाहें उनके लिए इस 22वें कुंड में स्नान करना ही पर्याप्त है। इन सभी कुंडों के नाम रामायण और महाभारत कालीन लोगों के नाम पर रखे हैं जैसे अर्जुन तीर्थ, नल तीर्थ, नील तीर्थ, गायत्री तीर्थ, सावित्री तीर्थ और सरस्वती तीर्थ, गंगा-जमुना तीर्थ,आदि आदि। मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण इन कुंडों में स्नान के पश्चात ही मंदिर में दर्शन के लिए जाते है, वैसे इसके लिए कोई बाध्यता नहीं है, बिना इसमें स्नान के भी दर्शन किया जा सकता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु चाहे इन कुंड में स्नान करें या न करें पर मंदिर से करीब 200 मीटर की दूरी पर यहाँ के महत्वपूर्ण स्नान अग्नितीर्थम (समुद्र) में स्नान जरूर करते हैं।

Friday, August 4, 2017

देवी पद्मावती मंदिर (तिरुपति) यात्रा और दर्शन

देवी पद्मावती मंदिर (तिरुपति) यात्रा और दर्शन



तिरुमला की सप्तगिरि पहाड़ियों में स्थित भगवान् वेंकटेश के दर्शन के उपरांत हम कल ही तिरुमला से तिरुपति आ गए थे और आज हमें तिरुपति से चेन्नई होते हुए रामेश्वरम जाना था। हमारी ट्रेन दिन में 10 बजे थी और प्लान तो यही था कि सुबह सुबह तिरुपति शहर में एक दो घंटे घूमने के बाद निर्धारित समय पर स्टेशन पहुंचना है, पर एक मित्र के सुझाव के अनुसार मुझे अपनी योजना बदलनी पड़ी। अब हम तिरुपति के बाज़ारों में भटकने के बजाय देवी पद्मावती के दर्शन के लिए जाना था। वैसे तो पद्मावती मंदिर के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी थी कि ये मंदिर तिरुपति में स्थित है पर यहाँ कैसे जाएं और जाने के बाद कितना टाइम लगेगा ये सब पता नहीं होने के कारण मैंने इसे अपनी योजना में शामिल नहीं किया था। कभी कभी बिना सोचे हुए भी कुछ हो जाता है और यही मेरे साथ हुआ। कल रात में एक मित्र नरेंद्र शोलेकर ने मुझे पद्मावती मंदिर और वहां जाने के बारे में बताया और मैं वहां जाने को झट तैयार हो गया। शायद उनका मार्गदर्शन न होता तो शायद इस मंदिर के दर्शन से मैं वंचित रह जाता। 

Friday, July 28, 2017

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन





एक बहुत लम्बे इंतज़ार और लम्बे सफर के बाद हम आज उस जगह पर पहुंचे हुए थे, जहाँ हर दिन लाख लोग अपनी अपनी मुरादें लेकर आते रहते हैं लेकिन मैं यहाँ कोई मुराद या मन्नत लेकर नहीं आया था, मैं तो बस उस दिव्य जगह के दिव्य दर्शन के लिए यहाँ आया था। हर दिन सोचा करता था कि आखिर ऐसा क्या है उस जगह पर जहाँ हर दिन इतने सारे लोग जाते हैं और आज हम भी उसी जगह पर पहुंचे हुए हैं। शहरों की भाग दौड़ वाली जिंदगी से दूर यहाँ एक अलग ही शांति थी और इतने सारे लोग एक दूसरे से अनजान होते हुए भी अनजान नहीं दिख रहे थे। यहाँ एक साथ पूरे देश से आये हुए लोग देखे जा सकते हैं। सबकी अलग भाषा, अलग रहन सहन, अलग खान पान होते हुए भी यहाँ सब एक ही रंग में रंगे हुए नज़र आ रहे थे और वो रंग था भक्ति का। इस भीड़ में कुछ दूसरे देश के लोग भी दिखाई दे जाते थे और वो भी यहाँ आकर भक्ति के रंग में सराबोर थे। यहाँ आया हुआ हर व्यक्ति देश, राज्य, जाति, वर्ग, गरीब, अमीर को भूल कर बस भक्ति में लीन अपनी ही धुन में चला जा रहा था। यहाँ की स्थिति को देखकर मन में बस एक ही ख्याल आ रहा था कि काश हर जगह बस ऐसी ही शांति हो, जहाँ कोई किसी के आगे या पीछे न होकर बस एक साथ चल रहे हों। 

Thursday, May 4, 2017

बैजनाथ महादेव (Baijnath Mahadev), हिमाचल प्रदेश

बैजनाथ महादेव, पालमपुर
(Baijnath Mahadev, Palampur)

सबसे पहले आपको आज की योजना के बारे में बता दूँ। आज की मेरी योजना चिंतपूर्णी देवी से सीधे बैजनाथ जाने की है। साधन कुछ हो हो सकता है। चिंतपूर्णी देवी से ज्वालामुखी रोड तक बस से और वहां से ट्रेन से या फिर चिंतपूर्णी देवी से सीधे बैजनाथ तक बस से। उसके बाद 2:30 बजे वाली ट्रेन से बैजनाथ से पठानकोट और रात में पठानकोट में विश्राम और अगले दिन सुबह दिल्ली के लिए रवाना।

Tuesday, May 2, 2017

चिंतपूर्णी देवी (Chintpoorni Devi)

चिंतपूर्णी देवी (Chintpoorni Devi)




वैसे तो मुझे कहाँ जाना है इसके बारे में कोई योजना तो थी नहीं। बस जिधर मन हुआ उधर चले जाना था। पर फिर भी मैक्लोडगंज में बस पर बैठते ही मैंने चिंतपूर्णी देवी जाने का सोचा। इस समय 1:45 बजे थे।  बस चली और 2 :15 बजे हम धर्मशाला पहुँच गए।  वहां उतरे तो देखा कि ज्वाला देवी जाने के लिए एक बस जाने के लिए तैयार खड़ी है। मैं बस में घुसा और सबसे आगे की सीट पर बैठ गया। बस 2 मिनट में ही ज्वाला देवी के लिए चली।  कंडक्टर के आने पर मैंने उसे कहा कि मुझे चिंतपूर्णी देवी जाना है इसलिए आप मुझे काँगड़ा की टिकट दे दो, वहां से मैं दूसरी बस से चिंतपूर्णी देवी चला जाऊँगा। मेरी इस बात का उसने रुखा सा जवाब दिया कि काँगड़ा से चिंतपूर्णी देवी की बस नहीं मिलती है, इसी बस से आपको ज्वालादेवी जाना होगा फिर वहाँ से आपको चिंतपूर्णी देवी की बस मिलेगी।  फिर भी मैंने काँगड़ा का ही टिकट लिया कि जो होगा देखा जाएगा अगर बस नहीं मिली तो जहाँ रात होगी वहीं सो जाएंगे। खैर करीब 3 बजे हम काँगड़ा पहुंच गए।  वहां बस पर से ही एक बस दिखी जो चिंतपूर्णी देवी जा रही थी।  मैं इस बस से उतरा और उस बस में बैठ गया। 

Friday, April 14, 2017

ज्वालादेवी धाम (Jwaladevi Dham)

ज्वालादेवी धाम (Jwaladevi Dham)



ज्वालाजी मंदिर को ज्वालामुखी मंदिर भी कहते हैं ! ज्वालाजी मंदिर को भारत के 51 शक्तिपीठ में गिना जाता है ! लगभग एक टीले पर बने इस मंदिर की देखभाल का जिम्मा बाबा गोरखनाथ के अनुयायियों के जिम्मे है ! कहा जाता है की इसके ऊपर की चोटी को अकबर ने और शोभायमान कराया था ! इसमें एक पवित्र ज्वाला सदैव जलती रहती है जो माँ के प्रत्यक्ष होने का प्रमाण देती है ! ऐसा कहा जाता है कि माँ दुर्गा के परम भक्त कांगड़ा के राजा भूमि चन्द कटोच को एक सपना आया , उस सपने को उन्होंने मंत्रियों को बताया तो उनके बताये गए विवरण के अनुसार उस स्थान की खोज हुई और ये जगह मिल गयी , जहां लगातार ज्वाला प्रज्वलित होती है ! ये ही ज्वाला से इस मंदिर का नाम ज्वाला जी या ज्वालामुखी हुआ ! इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है बल्कि प्राकृतिक रूप से निकलती ज्वाला की ही पूजा होती है ! एक आयताकार कुण्ड सा बना है जिसमें 2-3 आदमी खड़े रहते हैं !

Friday, March 17, 2017

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi)-2016


वैष्णो देवी यात्रा (2016)



वैसे तो वैष्णो देवी की ये मेरी चौथी यात्रा है। इस बार भी पिछले साल की तरह नवरात्रों में अकेले जाने का प्लान किया। टिकट जून में ही बुक कर लिया था।  जाने का टिकट 8 अक्टूबर का और आने का 10 अक्टूबर का संपर्क क्रांति से बुक किया।  जाने से 6-7 दिन पहले अपने ऑफिस में कई लोगो को पूछा पर कोई भी जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। अंत में मैंने यही सोचा कि इस बार भी अकेले ही जाएंगे। अब पता नहीं क्यों कोई चलने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे ये तो वो लोग ही जानते होंगे। मैंने लोगो को ये भी समझाया कि आप लोगो को ऑफिस से कोई छुट्टी नहीं लेनी पड़ेगी।  शनिवार को ऑफिस के बाद हम लोग रात में जायेगे, फिर रविवार, सोमवार और मंगलवार तीन दिन की छुट्टी है। जाने से दो दिन पहले एक बार फिर मैंने लोगो से पूछना शुरू किया कि कोई वैष्णो देवी चलेगे तो चलिए और इसी क्रम में मृणाल नाम के एक सहकर्मी से जैसे ही मैंने पूछा तो बिना एक पल देर किये उन्होंने जाने के लिए हामी भर दी। वैसे टिकट बुक करवाते समय मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने मना कर दिया था इसलिए उनसे मैं नहीं पूछ रहा था।  पर आज उन्होंने हां कर दिया।  अब जब उन्होंने हां कर दिया तो उनके लिए टिकट भी चाहिए।  खैर जो भी हो टिकट भी तत्काल से बुक कर लिया गया।

Tuesday, March 14, 2017

राजगीर (राजगृह, Rajgir)

राजगीर (राजगृह, Rajgir)


राजगीर जाने का प्लान कल नालन्दा में घूमते हुए ही तय हो गया था। बात ये तय हुई थी कि सुबह 6 बजे तक राजगीर के लिए निकल जाना है। 2 दिन का भारतीय रेल का सफर, 1 दिन शादी समारोह और 1 दिन नालंदा घूमते हुए कुल मिलाकर 4 दिन की जो थकान थी उसके कारण ऐसी गहरी नींद आयी कि हम लोग 6 बजे तक सोते ही रह गए। 6 बजे जागने के बाद हम लोग जल्दी जल्दी ब्रश किये और एक बैग में कपडे रखे और निकल गए। नहाने का प्लान तो राजगीर के गरम कुंड में ही था। 6:30 बजे घर से निकले और एक ऑटो में बैठकर बस स्टैंड आ गए। बिहार शरीफ से राजगीर की दूरी 25 किलोमीटर है और यहाँ से राजगीर के लिए हर 5 मिनट में बस मिल जाती है। बस स्टैंड आया तो राजगीर के लिए एक बस खुलने के लिए तैयार थी। कुछ सीटें भर चुकी थी और कुछ खाली थी। हम तीनों बस में बैठ गए। वही तीन प्राणी आज भी थे जो कल नालंदा में भटक रहे थे। 

Thursday, February 16, 2017

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi)-2015


वैष्णो देवी यात्रा (2015)


दो बार वैष्णो देवी जाने के बाद फिर से मेरा मन एक बार और वहां जाने का करने लगा। पिछले वर्ष वहां मैं नवरात्रों में गया था इलसिए इस बार भी मैंने नवरात्रों में ही जाने का प्लान किया। अपने ऑफिस और जान पहचान के लोगों से जाने के बारे में पूछा  लेकिन कोई भी वहां जाने के लिए तैयार नहीं हुआ।  अंत में मैंने अकेले ही जाने का मन बनाया।  स्कूल में छुट्टियां नहीं होने के करना पत्नी और बच्चे भी साथ नहीं जा सकते थे। उस समय दिल्ली से कटरा जाने वाली एकलौती ट्रेन श्री शक्ति एक्सप्रेस ही थी जो कटरा तक जाती थी पर उसकी टाइमिंग नई दिल्ली स्टेशन से शाम को 5 :30 पर थी इसलिए उस ट्रेन की टिकट नहीं लिया क्योकि उस ट्रेन का टिकट लेने पर ऑफिस से हाफ डे की छुट्टी लेनी पड़ती इसलिए मैंने दिल्ली से जम्मू तक का टिकट उत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से लिया। जम्मू से कटरा तक या तो बस या पैसेंजर ट्रेन से जाने का प्लान किया। आने के लिए मैं श्री शक्ति एक्सप्रेस टिकट लिया क्योकि वो रात में 11 बजे कटरा से चलती है। कटरा में ठहरने के लिए आई आर सी टी सी का ही गेस्ट हाउस बुक किया जो कटरा रेलवे स्टेशन की पहली मंज़िल पर स्थित है।

Monday, January 16, 2017

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi) 2014-2


वैष्णो देवी यात्रा (2014)-2



एक बार फिर वैष्णो देवी (वैष्णो देवी की दूसरी यात्रा)
जून 2014 में वैष्णो देवी यात्रा से आने के बाद पत्नी और बेटा गांव चले गए। 10 दिन मैं उन लोगों को लाने के लिए गया क्योंकि गरमी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने वाली थी। वहां जाने पर माताजी ने कहा कि तुम लोग तो वैष्णो देवी से आ गए पर अगर अगली बार जाओगे हम लोग भी चलेंगे। मैंने कहा ठीक है अगली बार सब लोग जाएंगे। बात यहीं पर ख़तम हो गयी।

मैं पत्नी और बेटे के साथ दिल्ली आ गया। 14 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली से कटरा तक जाने वाली पहली ट्रेन का उद्घाटन किया। हम टीवी पर यही न्यूज़ देख ही रहे थे कि कंचन ने कहा कि देखिये हम लोग 1 महीने पहले वैष्णो देवी गए थे तो ट्रेन वहां तक नहीं जाती थी लेकिन अब ट्रेन सीधे कटरा तक चली जाएगी तो क्यों न आने वाली नवरात्रि में मम्मी और पापा को आप वैष्णो देवी ले जाएँ। मैंने कहा कि आईडिया तो ठीक है पर इतनी जल्दी जाने के लिए ऑफिस से छुट्टी लेना मुश्किल है क्योंकि अभी हम लोग वैष्णो देवी गए तो छुट्टी लिए और उसके बाद अभी तुम लोगो को गांव से लाने गए तो छुट्टी लिए फिर छुट्टी लेना मुश्किल है।

Thursday, January 5, 2017

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi) 2014-1

वैष्णो देवी यात्रा-1 (2014)




बहुत दिनों सो सोच रहा था वैष्णो देवी यात्रा पर जाने का पर समय ही नहीं निकाल पा रहा था।  कभी बच्चे के स्कूल में छुट्टी नहीं मिलती और स्कूल में छुट्टी मिलती तो मुझे नहीं मिल पाती।  पर साल 2014 के आरम्भ में ही सोच लिया था कि चाहे कुछ  हो इस बार गर्मी की छुट्टियों में वैष्णो देवी जरूर जाऊँगा।  जून में जाने की प्लानिंग किया। टिकट अप्रैल में बुक करवाना होगा। टिकट बुक करने से पैरेंट्स को जाने के लिए कहा तो उन लोगों ने मना कर दिया कि उस समय रिस्तेदारों में बहुत सारी शादियां होती है तो वहां भी जाना पड़ता है, इलसिए तुम लोग चले जाओ हम लोग कभी बाद में जाएंगे। पेरेंट्स के मना करने पर मैं अपना, पत्नी और बेटे का टिकट बुक करना था। मैंने अप्रैल में ही टिकट ऑनलाइन 3  टिकट बुक किया।  दिल्ली से  जम्मू के लिए उत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12445) और आने का टिकट जम्मू-दिल्ली सराय रोहिल्ला दुरंतो एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12266) का ऑनलाइन टिकट (www.irctc.co.in) बनाया। आज ट्रेनें सीधे कटरा तक जाती है पर उस समय ट्रेन जम्मू या उधमपुर तक ही जाती थी। जम्मू से कटरा तक 2 घंटे  सफर बस से करना पड़ता था। ट्रेनें भले कटरा  तक नहीं जा रही थी पर कटरा में स्टेशन बनकर तैयार था अगर किसी चीज़ की देर  थी वहां तक ट्रेन के पहुँचने में तो माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्घाटन की। मेरी वहां की यात्रा के एक महीने बाद ही 14 जुलाई से कटरा तक ट्रेन जाने लगी थी और वह ट्रेन श्री शक्ति एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 22461 अप दिल्ली से कटरा और 22462 डाउन कटरा से दिल्ली) थी। कटरा में रहने के लिए मैंने कटरा रेलवे स्टेशन पर ही रेलवे का ही गेस्ट हाउस बुक किया जो ऑनलाइन (www.irctctourism.com/) ही बुक  होता है और वापसी  में दिन में रुकने के लिए जम्मू रेलवे स्टेशन पर रिटायरिंग रूम बुक किया।

रघुनाथ मंदिर, जम्मू (Raghunath Temple, Jammu)

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रघुनाथ मंदिर, जम्मू


रघुनाथ मंदिर के बारे में 

रघुनाथ मंदिर का निर्माण 1857 में महाराजा रणवीर सिंह और उनके पिता महाराजा गुलाब सिंह द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर में 7 ऐतिहासिक धार्मिक स्‍थल मौजूद है। मंदिर के आन्‍तरिक हिस्‍सों में सोना लगा हुआ है जो तेज का स्‍वरूप है। मंदिर में कई देवी और देवताओं की मूर्ति लगी हुई है। इस मंदिर में हिंदू धर्म के 33 करोड़ देवी और देवताओं की लिंगम भी बने है जो मंदिरों में एक इतिहास है। श्रद्धालुओं को यहां आकर काफी आश्‍चर्य होता है।

  • यह मन्दिर आकर्षक कलात्मकता का विशिष्ट उदाहरण है।
  • रघुनाथ मंदिर भगवान राम को समर्पित है।
  • यह मंदिर उत्तर भारत के सबसे प्रमुख एवं अनोखे मंदिरों में से एक है।
  • इस मंदिर को सन् 1835 में इसे महाराज गुलाब सिंह ने बनवाना शुरू किया पर निर्माण की समाप्ति राजा रंजीत सिंह के काल में हुई।
  • मंदिर के भीतर की दीवारों पर तीन तरफ से सोने की परत चढ़ी हुई है।
  • इसके अलावा मंदिर के चारों ओर कई मंदिर स्थित है जिनका सम्बन्ध रामायण काल के देवी-देवताओं से हैं।
  • रघुनाथ मन्दिर में की गई नक़्क़ाशी को देख कर पर्यटक एक अद्भुत सम्मोहन में बंध कर मन्त्र-मुग्ध से हो जाते हैं।

Tuesday, January 3, 2017

केदारनाथ (Kedarnath)

केदारनाथ (Kedarnath)

चौथा दिन

सुबह के 3 बजते ही मोबाइल का अलार्म बजना शुरू हो गया। नींद पूरी हुई नहीं थी इसलिए उठने का मन बिलकुल नहीं हो रहा था।  सब लोगों को जगाकर मैं एक बार फिर से सोने की असफल कोशिश करने लगा।जून के महीने में भी ठण्ड इतनी ज्यादा थी कि रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं हो रहा था। 5 बजे तक हम लोगों को तैयार होकर गेस्ट हाउस से केदारनाथ के लिए निकल जाना था इसलिए ना चाहते हुए भी इतनी ठण्ड में रजाई से निकलना ही था। पहले तो पिताजी और बेटे नहाने गए। उसके बाद माताजी और पत्नी की बारी आयी। मेरा मन गरम पानी के झरने में नहाने का करने लगा पर हिम्मत नहीं हो रही थी कि बाहर निकलें। कमरे के अंदर का तापमान जब 5 डिग्री के करीब था तो सोचिये बाहर का तापमान कितना होगा। फिर मैं टॉर्च और एक टॉवेल लिया और पिताजी को ये बोलकर कि मैं कुछ देर में आता हूँ और तेज़ी से कमरे से निकल गया। बाहर निकलते ही ठण्ड ने अपना असर दिखाया। ऐसा लग रहा था कि मैं किसी बर्फ से भरे  किसी टब में हूँ। मैं दौड़ता हुआ गेस्ट हाउस की 50 सीढियाँ उतर गया। हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। उस सन्नाटे में मन्दाकिनी नदी की पानी के बहने की जो आवाज़ थी बहुत ही मधुर लग रही थी। मन्दाकिनी की आवाज ऐसे लग रही थी जैसे कोई संगीत की धुन हो। मैं सीढ़ियों से उतरने के बाद मन्दाकिनी की तरफ गया और देखने लगा की गरम पानी का झरना किधर है।

Saturday, December 31, 2016

बदरीनाथ (Badrinath)

बदरीनाथ (Badrinath)

बदरीनाथ  के बारे में 
बदरीनाथ भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक स्थान है जो हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ है। यह उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित एक नगर पंचायत है। यहाँ बद्रीरीनाथ मन्दिर है जो हिन्दुओं के चार प्रसिद्ध धामों में से एक है। बदरीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते रूद्वप्रयाग में मिल जाते है। रूद्रप्रयाग में मन्दाकिनी और अलकनन्दा का संगम है। जहां दो नदियां मिलती है, उस जगह को प्रयाग कहते है। बदरी-केदार की राह में कई प्रयाग आते है। रूद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ जाना चाहतें है, वे उधर चले जाते है। भारत के प्रसिद्ध चार धामों में द्वारिका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर व बदरीनाथ आते है. इन चार धामों का वर्णन वेदों व पुराणौं तक में मिलता है. चार धामों के दर्शन का सौभाग्य पूर्व जन्म पुन्यों से ही प्राप्त होता है. इन्हीं चार धामों में से एक प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ धाम है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है. बद्रीनाथ धाम ऎसा धार्मिक स्थल है, जहां नर और नारायण दोनों मिलते है. धर्म शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इसे विशालपुरी भी कहा जाता है. और बद्रीनाथ धाम में श्री विष्णु की पूजा होती है. इसीलिए इसे विष्णुधाम भी कहा जाता है. यह धाम हिमालय के सबसे पुराने तीर्थों में से एक है. मंदिर के मुख्य द्वार को सुन्दर चित्रकारी से सजाया गया है. मुख्य द्वार का नाम सिंहद्वार है. बद्रीनाथ मंदिर में चार भुजाओं वली काली पत्थर की बहुत छोटी मूर्तियां है. यहां भगवान श्री विष्णु पद्मासन की मुद्रा में विराजमान है. बद्रीनाथ धाम से संबन्धित मान्यता के अनुसार इस धाम की स्थापना सतयुग में हुई थी. यहीं कारण है, कि इस धाम का माहात्मय सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है. इस धाम में स्थापित श्री विष्णु की मूर्ति में मस्तक पर हीरा लगा है. मूर्ति को सोने से जडे मुकुट से सजाया गया है. यहां की मुख्य मूर्ति के पास अन्य अनेक मूर्तियां है. जिनमें नारायण, उद्ववजी, कुबेर व नारदजी कि मूर्ति प्रमुख है. मंदिर के निकट ही एक कुंड है, जिसका जल सदैव गरम रहता है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है, इसीलिए इसे वैकुण्ठ की तरह माना जाता है. यह माना जाता है, कि महर्षि वेदव्याज जी ने यहीं पर महाभारत और श्रीमदभागवत महान ग्रन्थों की रचना हुई है. यहां भगवान श्री कृ्ष्ण को केशव के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त इस स्थान पर क्योकि देव ऋषि नारद ने भी तपस्या की थी. देव ऋषि नारद के द्वारा तपस्या करने के कारण यह क्षेत्र शारदा क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है. यहां आकर तपस्या करने वालों में उद्वव भी शामिल है. इन सभी की मूर्तियां यहां मंदिर में रखी गई है. मंदिर के निकट ही अन्य अनेक धार्मिक स्थल है. जिसमें नारद कुण्ड, पंचशिला, वसुधारा, ब्रह्माकपाल, सोमतीर्थ, माता मूर्ति,शेष नेत्र, चरण पादुका, अलकापुरी, पंचतीर्थ व गंगा संगम.