Sunday, June 17, 2018

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-6 : मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम (Mangalnath Temple and Sandipani Ashram)

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-6 : मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम (Mangalnath Temple and Sandipani Ashram) 




उज्जैन के दर्शनीय स्थानों के भ्रमण की श्रृंखला में महाकालेश्वर मंदिर, विक्रमादित्य का टीला, हरसिद्धी मंदिर, भतृहरि गुफा, गढ़कालिका मंदिर, कालभैरव मंदिर और सिद्धवट मंदिर जैसी जगहों को देखने के पश्चात आइए अब हम आपको मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम लेकर चलते हैं। सिद्धवट मंदिर में पुजारियों की बातों से दुखी और व्यथित होकर सिद्धवट मंदिर क्षेत्र से निकलने के पश्चात देवी को अर्पित करने के लिए मैंने जो फूल खरीदा था वो फूल मैंने दुकान वाले को ही वापस कर दिया और फूल के पैसे देकर चुपचाप उदास मन से आॅटों में आकर बैठ गया। आॅटो वाला मुझे फूल वापस करते हुए देख लिया था तो उसने झट पूछ बैठा कि क्या हुआ जो आपने फूल वापस कर दिया, ज्यादा भीड़ थी क्या? मैंने उसे सारी बातें बताई तो बोला कि इन पुजारियों का अब ये रोज का काम हो गया। यहां आने वाले आधे से ज्यादा लोग इसी तरह दुखी होकर जाते हैं। आपने तो फूल वापस लाकर दुकान वाले को दे दिया पर लोग वहीं मंदिर के आस-पास ही कहीं रख कर चले आते हैं। मैंने भी उदास मन से यही कहा कि चलिए जिनकी जो गति होनी है वो तो होगी ही हम श्रद्धालु लोग ही पागल हैं जो मंदिरों के चक्कर में यहां तक आते हैं। मेरी इस बात का उस आॅटो वाले ने बहुत ही भावुक जवाब दिया।

कहने लगा कि यदि लोग केवल ये सोचकर आना बंद कर दें कि पुजारियों के कारण ऐसा होता है तो हम गरीबों का गुजारा कैसे होगा। आप आए तो मुझे आज कुछ पैसे की आमदनी हुई। यदि यहां आने वाला हर व्यक्ति ये सोच ले कि कहीं नहीं जाना तो लोगों के रोजी-रोजगार भी तो बंद हो जाएंगे। पूरे देश से लोग यहां घूमने और कुछ देखने आते हैं तो हम जैसे आॅटो वाले, फूल वाले का परिवार चलता है। इसलिए ऐसी कोई बात मन में न रखें। बात तो आॅटो वाला भी सही कह रहा था कि अगर लोग ऐसी छोटी बातों से कहीं आना-जाना बंद कर दें तो लोगों को दिक्कत भी तो हो जाएगी। खैर अब तक के हिसाब हम जितने मंदिरों में गए हैं, दो-चार मंदिरों के अलावा हर जगह अनुभव बुरा ही रहा है। अब तो मंदिरों से भी मन उठने लगा है पर क्या करें देवों में यकीन करने वाला मेरा आस्तिक मन इतने दुत्कार के बाद भी नहीं मानता और चला जाता हूं मंदिरों की तरफ। इसी तरह बातें करते हुए सिद्धवट मंदिर से मंगलनाथ मंदिर तक का सफर कब पूरा हो गया पता ही नहीं चला।

मंगलनाथ मंदिर : पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार मंगलनाथ मंदिर परिसर को ही मंगल का जन्म स्थान माना गया है। मंगलनाथ भगवान शिव के ही रूप हैं। मंगलनाथ मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है और इसे भारत का नाभि स्थल भी कहा जाता है। यह मंदिर अपने दैवीय गुणों के कारण अत्यंत प्रसिद्ध है। मंगल नौ ग्रहों में से एक ग्रह है। मंगल को अंगारक तथा कुज के नाम से भी जाना जाता है। वैदिक एवं पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान मंगल की माता पृथ्वी देवी है। मंगल ग्रह शक्ति, वीरता और साहस का परिचायक है तथा मंगल के जीवन का उद्देश्य धर्म की रक्षा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंगल के चार हाथ हैं और इनका हथियार त्रिशूल और गदा है। इनके श्ाृंगार में लाल रंग का प्रयोग होता है। मंगलनाथ मंदिर में श्रद्धालु मंगलदोष तथा कालसर्प दोष का निवारण करने के लिए आते हैं। मंगलनाथ मंदिर में भगवान मंगलनाथ का प्रत्येक मंगलवार को भातपूजन किया जाता है।

मंगलनाथ मंदिर के पास पहुंचकर अभी आॅटो से उतरा भी नहीं था कि पास की प्रसाद की दुकान वालों ने धावा बोल दिया। सर मुझसे ले लीजिए, सर मेरे यहां से लीजिए, सर मेरे दुकान से ले लीजिए ठीक ठाक लगा दूंगा। अब ये समझ नहीं आता कि दस-बीस रुपए की प्रसाद में ये क्या ठीक-ठाक लगा देंगे। ये तो ऐसे कर रहे जैसे कोई बड़ा सौदा होने वाला है। दुकानों वालेेे के आक्रमण से दुखी होकर मैंने साफ तौर पर कह दिया कि मुझे कोई प्रसाद नहीं लेना बस मैं ऐसे ही मंदिर जाऊंगा और दर्शन करके वापस आ जाऊंगा। मेरे इतना कहते ही दुकान वाले कहने लगे कि सर बिना प्रसाद के मंदिर में नहीं जाते। उनके इस बात पर मैंने केवल इतना ही कहा कि अकेला आदमी हूं और आप दस लोगों ने धावा बोल दिया है तो मैं क्या करूं। प्रसाद तो किसी एक ही दुकान से लूंगा न कि आप सभी की दुकान से। इसलिए मेरा पीछा छोडि़ए, मैं किसी दुकान से प्रसाद लेकर ही जाऊंगा। उसके बाद मैंने एक दुकान से प्रसाद लिया और मंदिर की तरफ बढ़ गया।

मंदिर परिसर में कदम रखते ही पुजारियों और पंडों का तांडव आरंभ हो गया। कोई 51 तो कोई 101 तो कोई 251 वाली पूजा करवाने के लिए आगे आने लगे। पर उनकी बातों की अनुसना करते हुए हम चुपचाप लाइन में जाकर खड़े हो गए। उज्जैन आने वाले कुछ लोग ही ईधर आते हैं इसलिए ज्यादा भीड़ नहीं थी। मुश्किल से 50 आदमी होंगे और उन सबके पीछे ही मैं भी खड़ा हो गया। धीरे-धीरे लाइन खिसकती रही और हम भी लाइन के साथ आगे बढ़ते रहे और आखिरकर मंदिर के दरवाजे पर पहुंच गए। अंदर जाते ही 51, 101 और 251 वाली पूजा को देखा। मैं तो बिना पैसे की पूजा करने गया था तो बिना किसी पुजारी के मदद के ही आराम से बेलपत्र अर्पित करके पूजा किया और और दान-दक्षिणा देकर आराम से मंदिर से बाहर निकल आया। कुछ पल मंदिर परिसर में बिताने और कुछ फोटो लेने के बाद हम मंदिर से बाहर आ गए। मंदिर से बाहर प्रसाद के पैसे देकर हम आॅटो में बैठ गए।

आॅटो में बैठते ही आॅटो वाले गाड़ी स्टार्ट किया और संदीपनी आश्रम की ओर चल पड़ा। ऐसे ही मैंने आॅटो वाले से ये सवाल किया कि आप लोगों को दुकान वाले से कितना कमीशन मिलता है प्रसाद लेने पर तो उसका जवाब मिला कि पांच रुपए से लेकर 25 रुपए तक। मैंने उसे जरा विस्तार से समझाने के लिए बोला तो उसने बताया कि यदि आप 51 रुपए का प्रसाद लेंगे तो मुझे कमीशन के तौर पर 5 रुपए मिलेंगे, 101 और 151 रुपए वाले में 10 रुपए, 201 रुपए वाले में 15 रुपए और 251 रुपए या उससे अधिक का प्रसाद लेने पर 20 रुपए से लेकर 25 रुपए तक मिलते हैं। आॅटो वाले से मेरा अगला सवाल ये था कि ऐसा सभी मंदिरों में होता है या एक दो जगह ही तो उसने बताया कि केवल दो जगह कालभैरव और मंगलनाथ में होता है और बाकी जगह नहीं। मतलब यही निकला कि प्रसाद खरीदिए या किसी दुकान में कोई सामान खरीदिए हर जगह इन लोगों का कमीशन बंधा हुआ है। ऐसा केवल यहीं नहीं हर शहर और हर पर्यटन स्थन और तीर्थ स्थल पर है। इसी वाकये से हमें आगरा के ऊंट गाड़ी वाले की याद आ जाती है जब उसने मुझे ताजमहल परिसर में ही 5 मिनट के सफर में ही एक साड़ी की दुकान में घुसा दिया था और कुछ नहीं खरीदने पर वहीं छोड़कर भाग गया था, पर वो मेरी पहली घुमक्कड़ी थी इसलिए उतना नहीं समझ सका था। चलिए ये तो होता ही रहेगा और हम आगे चलते हैं। करीब दस मिनट से भी कम समय में हम मंगलनाथ मंदिर से संदीपनी आश्रम पहुंच गए। 

संदीपनी आश्रम : संदीपनी आश्रम उज्जैन के मंदिर शहर से दो किलोमीटर दूर स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। इस जगह का पौराणिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि गुरु संदीपनी इस आश्रम का उपयोग श्रीकृष्ण, उनके मित्र सुदामा और भाई बलराम को पढ़ाने के लिए करते थे। इस जगह का उल्लेख महाभारत में किया गया है। अब इस आश्रम को एक मंदिर में परिवर्तित कर दिया गया हे जो गुरु संदीपनी को समर्पित है। इस आश्रम के पास एक पत्थर पर 1 से 100 तक गिनती लिखी है ओर ऐसा माना जाता है कि यह गिनती गुरु संदीपनी द्वारा लिखी गई थी। इस आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण, सुदामा तथा बलराम ने गुरुकुल परंपरा के अनुसार विद्या अध्ययन किया था। संदीपनी आश्रम के पास गोमती कुंड स्थित है जो कि एक छोटी पानी की टंकी है। ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण ने पवित्र केंद्रों के सारे पानी को गोमती कुंड की ओर मोड़ दिया था ताकि गुरु संदीपनी को आसानी से पवित्र जल मिलता रहे। गुरु संदीपनी के समय में इस आश्रम में युद्ध कलाएँ भी सिखाई जाती थी तथा दिन के अंत में आध्यात्मिक संरेखण ही मुख्य उद्देश्य था।

संदीपनी आश्रम पहुंचकर मुख्य दरवाजे से प्रवेश करते ही सबसे पहले छोटे-छोटे क्यारियों में लगे हुए सुंदर सुंदर फूलों से सामना हुआ। इन फूलों को देखते ही पूरे दिन की थकान फुर्र हो गई। थोड़ा और आगे बढ़े से तो देखा कि एक छोटा सा मंदिर है जहां कृष्ण की प्रतिमा स्थापित है और वहीं पर सुदामा और बलराम की भी प्रतिमा स्थापित थी। वहीं पर कुछ पुजारी 20 रुपए में मनोकामना पूर्ति यंत्र बेचने में लगे हुए थे और कुछ लोग खरीद भी रहे थे। पता नहीं उस समय मेरे मन में क्या आया कि मैंने उन पुजारियों से एक वाक्य पूछ लिया और वो भड़क गए। बस इतना ही तो पूछा था कि पुजारी जी क्या ये सारी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला यंत्र है तो आप यहां 20 रुपए का धंधा क्यों कर रहे हैं मनोकामना पूर्ण करवाइए और बड़ा सा व्यापार कीजिए। इन 20 रुपए वाले व्यापार से कुछ नहीं होगा। मेरी इतनी बात पर वे लोग इतना भड़के कि क्या कहूं उसका वर्णन करने लगूं तो बहुत ज्यादा हो जाएगा। यहां से लड़ने-भिड़ने के पश्चात थोड़ा आगे बढ़े तो एक तालाब रूपी कुंड के दर्शन हुए जिसके आगे एक बोर्ड पर गोमती कुंड लिखा हुआ था। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने सारे पवित्र जलस्रोतों के पानी का इस कुंड में ला दिया था जिससे उनके गुरु संदीपनी को हर दिन पूजा-पाठ के लिए पवित्र जल उपलब्ध होता रहे। थोड़ा और आगे बढ़े तो एक संग्रहालयनुमा बड़े कक्ष में पहुंच गए जहां श्रीकृष्ण, सुदामा और बलराम की बचपन की लीलाओं को चित्रण किया हुआ मिला। उनके बचपन की हर बात को इन चित्रों और प्रतिमाओं इस तरह से सुसज्जित किया गया कि देखकर लगता है कि हम सदियों पुराने कृष्ण के समय में जी रहे हैं। 

उस कक्ष से निकलकर हम एक दूसरे कक्ष में पहुंचे तो देखा कि यहां कुछ लोग एक विशेष प्रकार का चूर्ण लोगों को खाने के लिए दे रहे हैं और वहीं बगल में 20 रुपए प्रति डिब्बे के हिसाब से बेच भी रहे हैं। उस चूर्ण का स्वाद इतना अच्छा था कि अधिकतर लोग उस चूर्ण को खरीद रहे थे। बहुत बहुत सोच-विचार कर मैंने भी तीन डिब्बा खरीद लिया और कक्ष से बाहर आ गया। कुछ और पल यहां बिताने के बाद हम वापस चल दिए। अब तक सूर्य देवता भी दिन भर चमकने के बाद थक कर वापस अपने घर रात्रि विश्राम के लिए जा रहे थे। उनकी देखा-देखी मैंने भी तेज कदमों से आश्रम से वापस निकल गया और आॅटो में जाकर बैठ गया। आॅटों में बैठते ही आॅटो वाले ने मुझे कहा कि जितने जगह मैंने कहा था उतने जगह आपको घुमा दिया और अब हम आपको वापस हरसिद्धी मंदिर के पास ही छोड़ देंगे और उसके बाद उसने आॅटो स्टार्ट किया और आगे चल पड़ा। करीब 15 मिनट में हम हरसिद्धी मंदिर के पास पहुंच गए और उनको पैसे देने के बाद अपना बैग उठा कर चलने के लिए सोचा ही था कि आॅटो वाले ने बहुत ही प्यार से कुछ शब्द बोला। वो शब्द ये था कि साहब वो कालभैरव के प्रसाद के बारे में आपने कहा था कि सफर पूरा होने पर आप मुझे दे देंगे पर आपने मुझे दिया ही नहीं। मैंने उसे बताया कि भाई ध्यान से उतर गया और देना भूल गया। 

आॅटो से उतरकर हम एक बार फिर से हरसिद्धि मंदिर गए और फिर वहां से हरसिद्धि चैराहे की तरफ बढ़ गए। घड़ी देखा तो सात बज चुके थे और रात भी हो चली थी। यहां से अब हमें पहले बस अड्डे जाना था जहां से बस से इंदौर पहुंचना और घुमक्कड़ मित्र सुमित शर्मा से मिलना और उनके घर पर रात्रि विश्राम करना था। यहां से इंदौर जाने वाले बस स्टेशन तक के लिए आॅटो के बारे पता किया तो लोगों ने बताया कि बस अड्डे तक जाने के लिए आॅटो महाकालेश्वर मंदिर के पास मिलेगी तो हम उसी तरफ बढ़ गए। मंदिर के पास जाकर एक शेयर आॅटो तो मिल गई पर आधे रास्ते तक के लिए और उसके आगे का आधा रास्ता दूसरे आॅटो जाना होगा और उसके बाद आॅटो में सवारी पूरी होने पर ही यहां से चलेगी और ऐसा ही आॅटो बदलने वाली जगह पर भी होगा। ईधर मौसम के रंग-ढंग भी अच्छे नहीं लग रहे थे, बादल तो बस बरसने को आतुर थे और देखते ही देखते बूंदा-बांदी आरंभ भी हो गई थी। क्या करें, क्या न करें के उधेड़बुन में खड़े-खड़े सोच ही रहे थे कि इतने में ही एक आदमी और आ गए और उन्होंने बोला कि भाई क्यों न हम दोनों मिलकर एक आॅटो रिजर्व करके बस अड्डे चल लेते हैं। सुझाव अच्छा था तो हमने भी मान लिया और एक रिजर्व आॅटो से बस अड्डे पहुंच गए। बस अड्डे पहुंचते ही एक इंदौर जाने वाली बस मिल गई। 

उज्जैन से इंदौर की दूरी करीब 56-57 किलोमीटर है और सड़क की स्थिति बहुत अच्छी है इस कारण इतनी दूरी को तय करने में बस को ज्यादा समय नहीं लगा। करीब घंटे भर या कुछ मिनट ज्यादा के सफर के बाद हम इंदौर पहुंच गए। मित्र सुमित शर्मा जी के बताए अनुसार हम उसी जगह पर उतर गए जहां उन्होंने बताया था। बस से उतरने के बाद दो मिनट चलने के बाद उनके क्लिनिक पर पहुंच गए। सुमित जी भी मेरे इंतजार में क्लिनिक के बाहर खड़े होकर मेरा इंतजार कर रहे थे। सुमित जी से मिलते ही सबसे पहले भरत मिलाप हुआ उसके बाद हाल-समाचार के बाद हम उनके क्लिनिक में ही बैठ गए। आधे घंटे बाद हम उनके बुलेट से उनके घर की तरफ चले। बुलेट पर बैठने का ये मेरा पहला अनुभव था, चाहे चार-पांच किलोमीटर ही सही। करीब दस मिनट बाद हम उनके साथ उनके घर पहुंच गए। घर में मां-पिताजी भी इंतजार में थे, चरण-स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लिया और फिर शुरू हुआ आवभगत का दौर। पहली बार इंदौर का राजसी खाना दाल-बाटी चूरमा का आनंद सुमित जी के साथ लिया। वैसे भी सुबह से कुछ खाया नहीं था तो अगर भोजन स्वादिष्ट नहीं भी होता तो भी स्वादिष्ट लगता पर यहां तो भोजन पहले से ही स्वादिष्ट था और उसके बाद मित्र के द्वारा परोसे जाने से और भी स्वादिष्ट हो चुका था। थोड़ा और, थोड़ा और करते हुए पूरा भोजन साफ कर दिया गया। एक आभासी दुनिया के मित्र से मिल कर पहले तो मन तृप्त हुआ, उसके बाद उनके हाथ से परासे खाए खाने से पेट तृप्त हो गया। 

खाना खा चुकने के बाद अब हम उनके साथ उनकी गाड़ी में इंदौर घूमने निकल पड़े। सबसे पहले रजवाड़े को देखा गया जहां पंद्रह अगस्त और कृष्ण जन्मष्टमी के लिए तैयारियां जोरों पर थी। वही बगल में एक खाऊ बाजार है। खाऊ बाजार मतलब कि खाने-पीने की चीजों से भरा-पूरा बाजार, तरह तरह की मिठाइयां, चाट, पकौड़े आदि आदि चीजों का भरापूरा बाजार है। हमने पूरा बाजार घूम लिया, सुमित जी खाने के लिए पूछते रहे और हम मना करते रहे। दाल-बाटी से ही पेट पूरा भरा हुआ था और क्या खाते। खैर किसी तरह एक दूध वाले के पास एक गिलास दूध पीया और फिर घर की तरफ वापस हो लिए। कुछ ही देर मंे हम घर पहुंच गए और साने की तैयारियों में लग गए। सोने से पहले कुछ घुमक्कड़ी की बातें होने लगी और और बातें करते करते कब नींद आ गई कुछ पता नहीं चला। आज के इस पोस्ट में बस इतना ही। इससे आगे का वृत्तांत अगले पोस्ट में जिसमें हम आपको अपने साथ ओंकारेश्वर ले चलेंगे। तब तक के लिए आज्ञा दीजिए।


इस यात्रा के अन्य भाग भी अवश्य पढ़ें

भाग 1: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-1 : दिल्ली से उज्जैन
भाग 2: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-2 : महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
भाग 3: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-3 : विक्रमादित्य का टीला और हरसिद्धी मंदिर
भाग 4: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-4 : भतृहरि गुफा और गढ़कालिका मंदिर
भाग 5: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-5 : कालभैरव मंदिर और सिद्धवट मंदिर
भाग 6: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-6 : मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम



आइये अब इस यात्रा के कुछ फोटो देखते हैं :


मंगलनाथ मंदिर परिसर

मंगलनाथ मंदिर परिसर में ही एक अन्य मंदिर

मंगलनाथ मंदिर का ऊपरी भाग

बरसने का आतुर बादल

एक अन्य मंदिर का गुम्बद

मंदिर से नीचे उतरने का रास्ता

मंदिर का दूसरा दरवाजा

सड़क से मंदिर जाने वाला दरवाजा

सड़क पर मार्गदर्शक बोर्ड

संदीपनी आश्रम की चहारदीवारी

संदीपनी आश्रम का प्रवेश द्वार

संदीपनी आश्रम के बारे में जानकारी वाला बोर्ड

संदीपनी आश्रम के बारे में जानकारी वाला बोर्ड

आश्रम के अंदर का एक दृश्य

आश्रम के अंदर एक मंदिर जहां कृष्ण, बलराम की प्रतिमा स्थापित है

आश्रम परिसर में ही एक अन्य मंदिर

आश्रम परिसर के अंदर का एक दृश्य

एक पेड़ जिसकी पूजा होती है

कृष्ण, बलराम और सुदामा

आश्रम में लटका शिकायत पेटी

आश्रम में स्थित एक मंदिर के बारे में जानकारी

उज्जैन की एक सड़क

हरसिद्धी चैराहे पर हरसिद्धी गेस्ट हाउस की जानकारी वाला बोर्ड

विक्रमादित्य के टीले की ओर जाने वाला दरवाजा

हरसिद्धी मंदिर से मंदिर की ओर जाने वाला रास्ता

रात में महाकालेश्वर मंदिर का एक दृश्य

मंदिर के पास दुकानों का दृश्य


इस यात्रा के अन्य भाग भी अवश्य पढ़ें

भाग 1: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-1 : दिल्ली से उज्जैन
भाग 2: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-2 : महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
भाग 3: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-3 : विक्रमादित्य का टीला और हरसिद्धी मंदिर
भाग 4: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-4 : भतृहरि गुफा और गढ़कालिका मंदिर
भाग 5: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-5 : कालभैरव मंदिर और सिद्धवट मंदिर
भाग 6: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-6 : मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम



6 comments:

  1. उत्तर भारत मे मंदिरों में पंडो-पुजारियों ने बहुत ही माहौल खराब कर रखा है । मैं 2012 में जब उज्जैन गया था, तब मेरा अनुभव तो बढ़िया रहा । तब नौकरी में भी नही था । खैर ओरछा आइये बढ़िया अनुभव होगा ।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद पांडेय जी। कुछ लोगों के कारण कुछ अच्छे पुजारी भी इसकी भेंट चढ़ जाते हैं। ओरछा आना भी जल्दी ही होगा। इस वर्ष समय कुछ अच्छा नहीं गुजरा और साल के छः महीने तो ऐसे ही गुजर गए फिर भी कोशिश रहेगी कि अक्टूबर प्रथम सप्ताह में आने की। एक बार और धन्यवाद।

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  2. बहुत ही दिलचस्प यात्रा रही है आपकी सर जी।
    वैसे सर जी आॅटो वाले का कहना भी सही है, क्योंकि हमारा समाज एक दूसरे के सहयोग से ही तो चलता है उसी प्रकार उनकी आजीविका भी। वैसे आॅटो वाले ने अपने कमीशन के बारे आपको कैसे बता दिया क्योंकि इसके बारे में कोई बताता नहीं है यह सब आपकी बातों का प्रभाव था या आपके पास रखे अमानत के तौर उसके प्रसाद का प्रभाव था, और वहीं प्रसाद आप भूल रहे थे। आपको तो विशेष व्यक्ति जैसी अनुभूति होती होगी जब इतने सारे व्यक्तियों के बीच आप अपने आप को घिरा हुआ पाते होगें । खैर ये तो मजाक था सर जी। लेकिन मंदिर में चूर्ण कैसे बेचा जा रहा था सर आपने जो लिया वह चूर्ण था या कोई विभूति।
    खैर आपके दिनभर के उपवास का समापन हुआ और मित्र मिलन हुआ बहुत ही प्रसन्नता की बात है।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद अर्जुन जी। जब आप अपने कमेंट रूपी तालियों से लेख का स्वागत करते हैं तो मन का घोड़ा सातवें आसमान में दौड़ने लगता है और मयूर बन कर नाचने भी लगता है। सही कहा उस प्रसाद का ही कमाल था जो आॅटो वाले ने अपना कमीशन बता दिया। वो चूर्ण लगता है धनिया के पाउडर से बनाया गया था, बहुत ही स्वादिष्ट था। हां पूरे दिन के उपवास का समापन आखिरकर मित्रा के हाथों परोसे गए भोजन से तोड़ा और पेट भर कर पहली बार दाल-बाटी चूरमा का स्वाद लिया था।
      एक बार और धन्यवाद।

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  3. वाह भाई आपने उस ऑटो वाले के साथ दर्द को बांटा और उसने भी आपको अपना मानकर दर्द बताया...सुमीत जी के साथ के मिलन दिल से को आपने बहुत अच्छे से जिया....सराफा घूम कर कुछ न खाए यह तो सराफा के साथ अन्याय हो गया....बढ़िया पोस्ट भाई

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी। हां मेरी व्यथा सुनकर उसने भी अपने दुख का बयान कर दिया। जी सही कहा सुमित जी के बिताए गए उन पलों को कैसे भूल सकते हैं। उसे मीठे अहसास को शब्दों में लिख पाना संभव नहीं था फिर भी लिख दिया। हां ये तो सुमित जी भी उस दिन कह रहे थे कि ये तो सर्राफा के साथ अन्याय है कि मैंने पूरा सर्राफा घूम लिया और कुछ नहीं खाया।

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