Tuesday, August 28, 2018

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-10: ओंकारेश्वर से देवास (Omakareshwar to Dewas)

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-10: ओंकारेश्वर से देवास
(Omakareshwar to Dewas)





सुबह इंदौर से चलकर ओंकारेश्वर पहुंचना और तत्पश्चात् नर्मदा में स्नान करने के बाद मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करते करते दोपहर से ज्यादा का समय बीत चुका था। मंदिर में दर्शन के उपरांत कहां जाएं, कहां न जाएं की उहापोह वाली स्थिति उत्पन्न हो गई थी। तभी नदी के उसी तरफ से दिखाई देते एक बहुत बड़े शिव प्रतिमा को देखने की ललक से परिक्रमा पथ पर घूमने का मौका मिला। इस दौरान एक साथ कई कार्य हो गए थे। जैसे कि शिव प्रतिमा के दर्शन के साथ-साथ बहुत से पौराणिक और ऐतिहासिक स्थलों, मंदिरों और आश्रमों को देखने का मौका मिला। पूरे रास्ते नर्मदा, पहाड़, हरियाली, मंदिरों और पौराणिक स्थलों के अवशेष, पक्षियों का कलरव, बंदरों की धमाचैकड़ी ने उस समय का आनंद लेने का भरपूर मौका दिया था। हमने 1 बजे परिक्रमा आरंभ किया था और करीब 4ः30 बजे तक परिक्रमा पथ की परिक्रमा पूर्ण करके फिर से मंदिर तक आ गए थे। यहां पहुंचकर एक बार फिर से अपने भगवान भोले नाथ को प्रणाम करते हुए आगे के सफर पर निकल पड़ा। हमारी योजना ओंकारेश्वर से महेश्वर जाने की थी पर होनी को कुछ और ही मंजूर था और हम चले थे महेश्वर के लिए और पहुंच गए कहीं और। वो कहते हैं न कि दुनिया गोल है जहां से आप चलेंगे वहीं पहुंच जाएंगे और मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। चलिए हम आपने साथ आपको उसी जगह पर ले चलते हैं, जहां फिर से कल ही की तरह उसी शहर में आभासी दुनिया के अनजान लोगों का मिलन था, जहां एक अपनापन था, प्यार और स्नेह था।



परिक्रमा के पश्चात् जिस दुकान पर हमने अपना बैग रखा था आकर हमने अपना बैग लिया और चल दिया। मंदिर आने के लिए हमने नदी नाव से पार किया था और इस बार नदी के उस तरफ जाने के लिए हमने पुराने पुल का रास्ता लिया। पुल से पार करते हुए एक तरफ झूला पुल और ओंकारेश्वर डैम तो दूसरी तरफ संगम और हरियाली का अद्भुत नजारा देखने के लिए मिला। इस लेख को पढ़ने वाले सभी लोगों से हमारा एक आग्रह है कि अगर आप कभी ओंकारेश्वर आएं तो नदी पार करने के लिए एक बार पुराने पुल का और एक बार नए पुल (झूला पुल) का प्रयोग करें क्योंकि पुल को पैदल पार करते हुए जो दृश्य आपको देखने के लिए मिलेगा, उसे देखकर आपकी सारी थकान दूर हो जाएगी। हां तो हम बात कर रहे थे कि हमने नदी पार करने के लिए पुराने पुल का रास्ता लिया और खूबसूरत दृश्यों का आनंद लेते हुए और कुछ फोटो लेते हुए नदी के दूसरी तरफ पहुंच गए। इस पार आते ही तुरंत एक आॅटो मिल गई तो बस स्टेशन जा रही थी, लेकिन सीट के नाम पर उसमें एक छोटे से बच्चे के बैठने भर की सीट मुझे मिल रही थी इसलिए हमने उस आॅटो से न जाकर उसके बाद जाने वाली आॅटो का इंतजार किया। उस आॅटो के जाने के बाद दूसरे आॅटो वाले का नम्बर आया तो हम उस आॅटो में बैठ गए। जल्दी ही यह आॅटो भी सवारियों से भर गई और हम चल पड़े स्टेशन की तरफ। स्टेशन पहुंचकर पता लगा कि महेश्वर की अंतिम बस 5 बजे जाती है जो चली गई। शायद हम पहले वाले आॅटो से आ जाते तो महेश्वर जाने वाली बस मुझे मिल जाती पर अब तो पछताने के अलावा कोई उपाय था नहीं। अब मेरे पास दो रास्ते थे, या तो यहीं रात बिताया जाए या फिर इंदौर चला जाए। इसी उधेड़बुन में हम खड़े ही थे कि इंदौर जाने वाली बस आ गई और आधा हां, आधा ना करते हुए हम भी बस में सवार हो गए।

बस में बैठने का किस्सा भी उतना ही मजेदार है। बस जब सड़क पर ही थी तभी एक होटल वाले अपने यहां भोजन कर रहे आदमियों के लिए एक बड़े समूह के लोगों के लिए सीटों पर कब्जा जमा लिया था। जब बस आकर रुकी और सभी सवारियों के उतरने के बाद हमने जब बस में प्रवेश किया तो देखा कि खिड़की वाली अधिकतर सीटों पर कुछ न कुछ रखा हुआ जिससे से पता लग सके ये सीट किसी न किसी के लिए आरक्षित हो चुकी है। हम भी ठहरे थोड़े जिद्दी किस्म के इंसान चाहे जितनी भी गाडि़यां छोड़नी पड़ जाए हमें चाहिए खिड़की वाली सीट और हम एक रुमाल को हटाकर किसी और सीट पर रखकर उस पर बैठ गए। अब बारी उन लोगों की थी जिन लोगों के लिए सीटों को आरक्षित किया था। वे लोग भी एक एक करके बस में सवार होने लगे और आरक्षित सीटों पर बैठने लगे। इसी बीच एक आदमी और चढ़ा जिसने हमको ये कहते हुए वहां से हटने का त्वरित आदेश जारी कर दिया कि इस सीट पर उसने रुमाल रख दिया था। मैंने भी उसी अंदाज में उसे कहा कि हम कैसे हट जाएं इस सीट पर से, यहां हम आपसे पहले आकर बैठ गए हैं तो हटने का तो सवाल ही नहीं उठता। इस पर उसने मुझे बताया कि उसने यहां पर एक रुमाल रखा था, जिसे मैंने हटा दिया होगा। मैंने कहा कि ठीक है अगर आपको ऐसा लगता है कि हमने आपका रुमाल हटाकर आपकी सीट पर कब्जा जमाया है तो आप बैठ यहां जाइए, हम कहीं और बैठ जाएंगे या सीट नहीं मिलेगी तो दूसरी गाड़ी से जाएंगे।

इतना सुनते ही वो ऐसे खुश हुआ हुआ जैसे कि मैंने उसको ये सीट उपहारस्वरूप प्रदान किया हो, पर उसे नहीं पता था कि असली झमेला तो अब होगा। मेरे ये कहते ही आप यहां बैठिए हम कहीं और बैठ जाएंगे, उसने उसने एक आदमी को बैठने कहा तो मैंने उस बात का विरोध किया कि आपने सीट रखा था तो आपको ही बैठना पड़ेगा और आपके बदले कोई और नहीं बैठ सकता। इस पर उसने कहा कि हम तो यहीं दुकान पर बैठते हैं, इन सभी लोगों ने मेरे होटल में खाना खाया इसलिए इनको सीट दिलाने का काम मैंने किया। इस पर हमने केवल इतना ही कहा कि अब इस सीट पर या तो मैं बैठूंगा या आप बैठेंगे अगर किसी तीसरे को बैठना है तो बस के ड्राइवर और कंडक्टर को बुलाइए। मेरी बात पर उसने झट से कंडक्टर को बुला लिया। कंडक्टर को मैंने यही कहा कि ये आपकी बस है और केवल ये बता दीजिए कि केवल दस-बारह लोगों के समूह में यात्रा करने वाले लोग ही आपकी बस में सफर कर सकते हैं और मेरे जैसे अकेले यात्रा करने वाले या अपने एक-दो साथियों के साथ यात्रा करने वाले लोग आपकी बस में सफर नहीं कर सकते क्या? इस पर उसने बिल्कुल बेधड़क आवाज में कहा कि मुझे तो सवारी से मतलब अकले यात्रा करने वाले बस में बैठें या समूह में यात्रा करने वाले। तब मैंने उसे सारी बात बताई कि ये महोदय मुझे ये सीट छोड़ने कह रहे हैं और किसी तीसरे को यहां बैठाना चाहते हैं, पर हम जाएंगे तो इसी सीट पर वरना हम नहीं जाने वाले, हम आज रात ओंकारेश्वर में ही रहेंगे या फिर दूसरी बस से जाएंगे। उसके बाद कंडक्टर ये कहते हुए बस से नीचे उतर गया आप इसी सीट पर बैठै रहिए, वो दूसरी सीट पर कहीं बैठ जाएंगे। उसके बाद उसी समूह के एक बुजुर्ग व्यक्ति मेरे बगल में बैठे।

हमारी गाड़ी ठीक 5ः30 बजे अपने गंतव्य इंदौर की तरफ चल पड़ी। अब जब तक बस इंदौर पहुंचती है तब कि मैं आपको कुछ बताता हूं और उसके लिए मैं आपको बीते हुए कल में ले चलता हूं। कल जब मैं इंदौर में घुमक्कड़ मित्र डाॅक्टर सुमित शर्मा जी के यहां पहुंचा था, उसी समय दूसरे घुमक्कड़ मित्र मुकेश भालसे जी को मैसेज कर दिया था कि मैं इंदौर में हूं और उन्होंने उसका जवाब सुबह दिया था कि आप कहां हैं तो उनको सूचित कर दिया था कि अभी मैं ओंकारेश्वर जा रहा हूं अब आपसे अगली किसी यात्रा में मुलाकात होगी, पर होना तो कुछ और ही था क्योंकि वो मुलाकात आज ही लिखी हुई थी। बस के ओंकारेरश्वर से चलते ही मैंने फिर से मैंने उनको एक मैसेज भेज दिया कि मैं ओंकारेश्वर से इंदौर के रास्ते में हूं और 8 बजे तक इंदौर पहुंच जाऊंगा और कल सुबह आपसे मिलूंगा। उनको सूचित करने के बाद हम चलती बस से खूबसूरत दृश्यों का आनंद लेते हुए चले जा रहे थे और धीरे-धीरे शाम भी अपनी दस्तक देने लगी थी जो धीरे-धीरे अंधरे की तरफ बढ़ती जा रही थी। ईधर एक और मजेदार घटना घटी बस में। मेरे साथ वाली सीट पर वो जो चाचाजी बैठे थे बस के चलने के कुछ देर बाद ही अचानक ही लड़ाई के मूड में आ गए। कहने लगे कि खिड़की वाली सीट मुझे दे दो तो मैंने उनको कहा कि हम ये सीट आपको दे देंगे पर एक शर्त है जो मैं पहले भी बता चुका हूं कि मैं जाऊंगा तो इसी सीट पर वरना नहीं जाऊंगा तो अब तो बस चल पड़ी यहां से तो आप बस को वापस ओंकारेश्वर चलने कहिए फिर मैं उतर जाऊंगा और आप इस सीट पर बैठ जाइएगा। मेरी इस बात पर वो कुछ देर के लिए खामोश हो गए और हम भी एक बार फिर से खिड़की के शीशे के सहारे सिर टिकाकर आंखें बंद करके पूरे दिन हमने जिन जगहों को देखा उन दृश्यों की एक बार फिर से कल्पना करने लगे।

बस के बाहर दूर दूर तक अंधेरा पसरा हुआ था। बस के अंदर जलते बल्बों से जो थोड़ी बहुत रोशनी खिड़की से बाहर जा रही थी वहीं तक प्रकाश था और उसके आगे काला-घना अंधेरा अपना साम्राज्य फैलाए हुए था। सभी यात्री आपसे में बातें करने में व्यस्त थे पर हम तो अकेले थे तो हम अपने आप से ही बातें कर रहे थे। तभी अचानक उन चाचाजी ने मेरा ध्यान भंग कर दिया और पूछने लगे कि कहां से आए हो, कहां जाओगे आदि आदि बातें। उसके बाद दोनों में परिचय का संवाद चला और फिर उसके घुमक्कड़ी पर चर्चा होने लगी। कुछ हमने अपनी घुमक्कड़ी के किस्से उनको सुनाया, कुछ उन्होंने सुनाया। कुछ देर पहले सीट के लिए हम दोनों में ठनी हुई थी वो बहुत जल्दी ही घुमक्कड़ी की बातों के कारण एक स्नेह में बदल चुका था। उनकी बातों से पता चला कि वो ग्यारह ज्योतिर्लिंग का दर्शन कर चुके हैं और केदारनाथ जाना अभी बाकी है। मैंने उनको बताया कि मैं केदारनाथ जा चुका हूं। उसके बाद उनको वहां की स्थितियां, परिस्थितियां, मौसम का हाल बताया तो वो बहुत मायूस हुए। कहने लगे कि हमने गलती कर दिया कि जो वहां नहीं गए। मैंने उनको बताया कि कुछ नहीं हुआ आप जा सकते हैं। पैदल नहीं जा सकते तो घोड़ा और हेलीकाॅप्टर से भी जा सकते हैं। घोड़ा और हेलीकाॅप्टर की बात पर उन्होंने कहा कि ये दोनों ही चीजें मेरे लिए नहीं है। अगर पैदल जा सकता तो जाऊंगा नहीं तो गौरीकुंड तक जाकर भोलेनाथ को प्रणाम कर लूंगा। फिर मैंने उनको ये सलाह दिया कि यदि आप स्वस्थ हैं तो आप इस उम्र में भी वहां जा सकते हैं। आपके साथ यही होगा कि एक दिन में न पहुंचकर दो दिन में पहुंच लीजिएगा। उसके बाद भविष्य में संवाद कायम रखने के लिए मोबाइल नम्बरों का आदान प्रदान हुआ। इधर हम दोनों की बातें आपस में चल रही थी, उधर बस भी चली जा रही थी, साथ ही अंधेरा भी गहरा होता जा रहा था। बढ़ते अंधेरे के साथ बस के अंदर जो आपसी बातचीत का माहौल था वो भी धीरे धीरे शांति में बदलने लगी और कुछ ही देर में एक गहरी खामोशी में बदल गई।

बस चलती रही और समय बीतता रहा और करीब 8ः15 बजे हम इंदौर पहुंच गए। इंदौर पहुंचकर सबसे पहला काम हमारे लिए रात में रुकने का इंतजाम करना था। हम बस से उतरकर अपनी नजरें गोल गोल घूमा कर ईधर-उधर देख ही रहे थे कि बस में हमारे साथ सफर करने वाले उन चाचाजी ने पूछा कि अगर आपका रहने का कोई इंतजाम नहीं है तो आप हमारे साथ चलें क्योंकि हम 18 लोग हैं और एक आपके बढ़ जाने से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला। उन 18 लोगों में सभी उनके पारिवारिक सदस्य थे और एक हमारे शामिल हो जाने उनके लिए भी और हमारे लिए भी असहजता की स्थिति होती इसलिए हमने उनकी सुहृदयता को प्रणाम किया और ये कहते हुए मना कर दिया कि हमारे एक मित्र हैं जो हमें लेने के लिए आ रहे हैं। 

इसके बाद हम कमरे की तलाश में एक होटल में पहुंचे, कमरा देखने के बाद पैसे की बात हो ही रही थी कि मित्र मुकेश भालसे जी का फोन आ गया कि अगर आपको कोई दिक्कत नहीं हो तो आप हमारे यहां आ जाइए। उनसे उनके घर का पता पूछा तो उन्होंने किसी आॅटो वाले से बात करवाने के लिए कहा कि हम उसको समझा देंगे और वो आपको यहां पहुंचा देगा। हमने ऐसा ही किया और करीब 30 मिनट के सफर के बाद हम उनके दरवाजे पर पहुंच गए। जब हम उनके घर पहुंचे तो देखा मेरी अगवानी के लिए वो सपरिवार घर के बाहर खड़े मिले। जिस तरह से उन्होंने मेरा खयाल रखा, जितना सम्मान दिया उस हिसाब से एक पल के लिए ये नहीं लगा कि हम उनके लिए अनजान हैं और ये आभासी दुनिया के लोगों की पहली मुलाकात है, बिल्कुल ऐसा लगा जैसे हमारी उनकी पहचान बहुत पुरानी है। यही नहीं बच्चे लोग भी अंकल अंकल करते हुए मेरे साथ ऐसे घुल मिल गए जैसे वो मुझे बहुत पहले से जानते हैं। पहले कुछ मिनट हाल-समाचार और कुशल क्षेम पूछने के बाद खाने-पीने का दौर चला। खाना खा चुकने के बाद उन्होंने कल की योजना के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि सोचा तो महेश्वर जाने का था पर अब महेश्वर संभव नहीं है तो कल सुबह यहां से देवास जाएंगे और चामुंडा देवी के दर्शन के उपरांत उज्जैन पहुंचकर शाम की ट्रेन से दिल्ली की ओर प्रस्थान करेंगे। फिर उन्होंने बताया कि कि कल तो 15 अगस्त है और सुबह दो घंटे के लिए हमें अपने आॅफिस जाना होगा उसके बाद मैं वहां से 8 बजे तक वापस आऊंगा और उसके बाद आप जाने का प्लान कीजिए। वैसे तो हमने खुद अपने मन में यही सोचा था सुबह पांच से छह बजे के बीच निकल जाऊंगा पर अब जिनके यहां आएं थोड़ी उनकी भी माननी ही पड़ेगी, तो हम भी उनसे उनके वापस आने के बाद जाने की बात कह कर सोने की तैयारी करने लगे। जब यहां से देवास जाने का समय 8 बजे के बाद तय हुआ तो हमने भी मोबाइल का अलार्म साढ़े चार से बदलकर 6 बजे कर दिया और सोने का प्रयत्न करने लगे। पूरे दिन की थकान के कारण नींद कब आ गई कुछ पता नहीं चला।

सुबह अलार्म बजने से पहले ही हमारी नींद खुल गई। घड़ी देखा तो दिन और तिथि दोनों बदल चुके थे। अब तक भालसे परिवार के भी सभी सदस्य भी जाग चुके थे। सुप्रभात के बाद सभी लोग अपने अपने कामों में व्यस्त हो गए और हम भी जल्दी जल्दी नहा-धो कर तैयार हो गए। कितना भी जल्दी किए फिर भी सब कुछ करते करते घंटे भर का समय लग ही गया। 7 बजे सभी कामों से निपट कर चाय-नाश्ते का दौर चला। नाश्ता करने के बाद मुकेश भालसे जी आॅफिस के लिए निकल गए और दोनों बच्चे भी स्कूल के लिए। मुकेश भाई साहब के आॅफिस और दोनों बच्चों के स्कूल जाने के बाद मैं और कविता भाभी घर पर रह गए। समय सात से थोड़ा ज्यादा हुआ था और 8 बजे के आस-पास मेरा यहां से देवास के लिए जो निकलने का प्रोग्राम था वो मुझे कुछ और आगे बढ़ता हुआ दिख रहा था। कुछ देर बाद कविता भाभी ने कहा कि जब तक भाई साहब आते हैं तब तक हम आप सभी लोगों के लिए पोहे बनाते हैं फिर आने के बाद एक साथ बैठकर इंदौरी पोहे का स्वाद लिया जाएगा। 8 बजे के करीब मुकेश जी भी आॅफिस से आ गए और कुछ देर बाद बच्चे भी स्कूल से घर आ गए फिर हम सबने साथ मिलकर पोहे का स्वाद लिया। पोहे का स्वाद लेने के बाद हमने उनसे विदा होने की बात की कि अब हम चलेंगे तो बात खाने पर जाकर रुक गई कि ऐसे कैसे बिना खाना खाए चले जाएंगे। उसके बाद कविता जी खाना बनाने की तैयारी में लग गईं। कितना भी जल्दी किया गया तो भी खाना बनने और उसे खाने तक के करीब 9ः30 बजे का समय हो चुका था। सुबह से अब तक खाने का ही दौर चल रहा था, कभी नाश्ता, कभी पोहे, कभी चाय, कभी मिठाई और अब भरपेट भोजन। हर तरह के भोजन को निपटा लेने के बाद जब वहां से विदा होने के समय आया तो बहुत मना करने के बाद भी दोपहर और शाम को खाने के लिए भी कुछ रोटी और सब्जी एक बाॅक्स में बंद करके उन्होंने दे दिया।

प्यार भरी इस मुलाकात और स्वागत सत्कार के बाद अब यहां से चलने की बारी थी। घड़ी देखा तो 10 बजने वाले थे। बैग उठाकर नम आंखों से विदाई लेते और देते हुए घर से बाहर की तरफ प्रस्थान किए। साथ में मुकेश जी भी बाइक से मुझे जहां बस मिलेगी वहां तक छोड़ने के लिए चले। कल सुबह और आज सुबह की तुलना करता हूं तो कल सुमित जी बाइक चला रहे थे और मैं पीछे बैठकर बस स्टेशन जा रहा था और आज मुकेश जी बाइक चला रहे हैं और बस पकड़ने के लिए जाने वाला व्यक्ति कल की तरह मैं ही हूं। कुछ नहीं बदला केवल बाइक चलाने वाले का चेहरा बदल गया है, बाकी प्यार और स्नेह वही है जो कल था। करीब 20 मिनट के सफर के बाद हम उस जगह पर पहुंच चुके थे जहां से देवास की बस जाती है। दो-चार मिनट खड़े रहने के बाद एक देवास जाने वाली बस आ गई और फिर जल्दी से मिलने का वादा करके हम बस में सवार हो गए और देवास की तरफ चल पड़े। अब तक समय भी साढ़े दस हो चुका था। करीब 45 मिनट के सफर के बाद 11ः15 बजे हम देवास पहुंच गए। देवास शहर में प्रवेश करने से पहले ही पहाड़ी पर लगा जय माता दी का बड़ा सा बोर्ड दिखना शुरू हो गया था। बस चली जा रही थी तभी एक जगह चामुंडा देवी जाने का रास्ता लिखा हुआ दिख गया था, इसलिए बस से उतरकर किधर जाना ये किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। देवास पहुंचकर बस से उतरा और वापस उसी तरफ चल पड़ा। करीब पांच-सात मिनट में हम उस जगह पर पहुंच गए जहां से पहाड़ी पर चढ़ने का रास्ता है। अब इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। अगले भाग में हम आपको चामुंडा माता के दर्शन के लिए ले चलेंगे और उसके बाद उज्जैन होते हुए दिल्ली तक का सफर पूरा करेंगे। वैसे ये लेख थोड़ा लम्बा हो गया है उसके लिए साॅरी, क्योंकि इस लेख को दो भागों में करने का कुछ बन नहीं पा रहा था। इस भाग में लगाए गए सभी फोटो ओंकारेश्वर परिक्रमापथ के हैं।



इस यात्रा के अन्य भाग भी अवश्य पढ़ें

भाग 1: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-1 : दिल्ली से उज्जैन
भाग 2: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-2 : महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
भाग 3: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-3 : विक्रमादित्य का टीला और हरसिद्धी मंदिर
भाग 4: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-4 : भतृहरि गुफा और गढ़कालिका मंदिर
भाग 5: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-5 : कालभैरव मंदिर और सिद्धवट मंदिर
भाग 6: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-6 : मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम
भाग 7: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-7 : इंदौर से ओंकारेश्वर
भाग 8: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-8 : ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन
भाग 9: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-9 : ओंकारेश्वर परिक्रमा पथ
भाग 10: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-10: ओंकारेश्वर से देवास




आइये अब इस यात्रा के कुछ फोटो देखते हैं :





ओंकारेश्वर परिक्रमा पथ से नर्मदा का एक दृश्य


हम साथ-साथ हैं


सब मुझे अकेले छोड़कर चले गए


ओंकारेश्वर परिक्रमा पथ पर स्थित एक मंदिर का शीर्ष


खा लेने दो फिर फोटो लेते रहना


भोजन की तलाश में


लगता है कुछ दिख गया


मिल गया कुछ, अब खा लेता हूं


सेल्फी का भूत


नर्मदा में नहाते लोग


ओंकारेश्वर डैम


एक गुफा


झूला पुल


नर्मदा और नावें


नर्मदा, झूला पुल और नावें 


नर्मदा का एक दृश्य ये भी


ओंकारेश्वर के बाजार का एक दृश्य


देवास का बस स्टेशन


बस से दिखाई देता पहाड़ी पर स्थित एक मंदिर




इस यात्रा के अन्य भाग भी अवश्य पढ़ें

भाग 1: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-1 : दिल्ली से उज्जैन
भाग 2: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-2 : महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
भाग 3: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-3 : विक्रमादित्य का टीला और हरसिद्धी मंदिर
भाग 4: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-4 : भतृहरि गुफा और गढ़कालिका मंदिर
भाग 5: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-5 : कालभैरव मंदिर और सिद्धवट मंदिर
भाग 6: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-6 : मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम
भाग 7: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-7 : इंदौर से ओंकारेश्वर
भाग 8: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-8 : ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन
भाग 9: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-9 : ओंकारेश्वर परिक्रमा पथ
भाग 10: उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-10: ओंकारेश्वर से देवास





12 comments:

  1. मजेदार वृतांत सर
    ओर मुकेश जी व सुमित जी के परिवार के स्नेह को सादर वन्दन

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    1. धन्यवाद भाई जी, मुकेश जी और सुमित का स्नेह तो हर पल याद आता है

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  2. सुंदर यात्रा वृत्तांत ������
    किस्सा कुर्सी का हमेशा देखने सुनने में लाजवाब होता है , कुर्सी नेताओं की हो या सवारी गाड़ी में सीट पर बैठ कब्जा कर बैठने की जद्दोजहद तो चलती रहेगी दोनों ही सफर में , वैसे भी हमारे निमाड़ में यात्रा के दौरान सीट पर कब्जा आरक्षण के लिए रुमाल गमछा अचुक हथियार है । जिसका रुमाल सीट पे पहले से रखा हो वो सीट उसकी पक्की ����
    महेश्वर आने के लिए ॐकारेश्वर से बडृवाह आते तो आपको रात्रि ९बजे तक महेश्वर के लिए बस मिल जाती हैं
    जब भी कोई घुमक्कड़ी मित्र ॐकारेश्वर से महेश्वर आना चाहे तो वहां से बड़वाह आकर महेश्वर के लिए बहुत साधन मिल जाते हैं

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद जोशी जी।
      सही कहा आपने किस्सा कुर्सी का, नेताओं की कुर्सी हो, अधिकारियों की हो, या क्लास में अगली बेंच पर बैठने की खींचातान हो। सफर में गाडि़यों की सीट के लिए भी हालत होती है। आपके निमाड़ की तरह हमारे यहां भी रुमाल, गमछा या कुछ भी रख देना सीट पर कब्जा या आरक्षण की निशानी है, पर हम जैसे लोग उस रुमाल को हटाकर दूसरे सीट पर रख देते हैं।
      काश ये पहले से पता होता कि दूसरे रूट से गाड़ी महेश्वर के लिए मिल जाती तो ये मौका मेरे हाथ से नहीं जाता। घर से ही सोच कर चला था कि उज्जैन, ओंकारेश्वर और महेश्वर जाना है पर ये नहीं हो सका और हम महेश्वर की जगह देवास और दुबारा उज्जैन पहुंच गए। खैर इस बार न सही अगली बार तो महेश्वर होगा ही।

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  3. वाह भालसे जी से मिलन आपका....और हर जगह झगड़ा क्यो करते हो कुछ चीज़ें छोड़ देनी चाहिए कभी कभी.....बढ़िया आज का दिन हुआ कि आपने परिक्रमा भी कर ली....

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    1. धन्यवाद प्रतीक भाई। हां भालसे परिवार और बुलेट वाले डाॅक्टर साहब सुमित शर्मा जी से मिलना इस सफर का एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात थी। एक दिन डाॅक्टर साहब के यहां दूसरे दिन भालसे जी के यहां मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाया। बढि़या और यादगार मिलन।

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  4. वाह सिन्हा जी बहुत बढ़िया यात्रा रही।

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    1. आपको ढेर सारा धन्यवाद सर जी।

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  5. हर हर महादेव सर जी।
    हमेशा की तरह शानदार और जानदार लेख।
    कोई बात नहीं सर जी यदि आप महेश्वर महादेव मंदिर दर्शन के लिए नहीं जा पाए, भोलेनाथ आपको अगली बार दर्शन के लिए बुलाना चाह रहे होगें। कहते हैं ना जब तक भगवान का बुलावा ना आये तब तक हम उनके दर्शन के लिए नहीं जा सकते।
    बहुत अच्छे सर जी आखिरकार आपको खिड़की वाली सीट मिल ही गई, इसके लिए थोड़ा सा जद्दोजहद करना तो बनता है, क्योंकि आज के समय में अपनी पसंद की चीज इतनी आसानी से थोड़े ही मिलती है। हर जगह यही देखनेको मिलता है, सीट आरक्षित करने का सबसे बढ़िया और कारगर तरीका है सीट पर कोई भी अपनी वस्तु रख दो।
    आपके बगल से बैठे चाचाजी को शायद इसी बात का बुरा लगा होगा कि उनके परिवारजन का सदस्य उस सीट पर नहीं बैठ पाया, लेकिन बुजुर्ग व्यक्ति अधिक समय तक गुस्सा नहीं रहते इसीलिए उन्होंने पहले बात करके सुलह कर ली।
    आखिरकार आपको एक और आभासी दुनिया के मित्र से मिलने का मौका मिल गया । क्या अभूतपूर्व मेहमान नवाजी की उन्होंने।

    एक बात और है शायद आपको अच्छी ना लगे, मैंने इस बारे में काफी समय तक सोचा इसी कारण आपके लेख पर टिप्पणी करने में समय लग गया लेकिन मैंने सोचा कि आपको बता दें लेख में गलती से आपसे देवास की जगह इन्दौर लिख गया। आप 11:15 बजे देवास पहुँचे थे ना कि इन्दौर। मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मेरा उद्देश्य आपकी गलतियां निकालना नहीं है। पुनः एक बार फिर से क्षमा चाहता हूं।

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    1. हर हर महादेव अर्जुन जी।
      बहुत बहुत धन्यवाद आपको।
      हां सही कह रहे हों अगर हम महेश्वर चले जाते तो देवास बाकी रह जाता और देवास आए तो महेश्वर बाकी रह गया। एक को पूरा होना और एक को तो बाकी रहना ही था, तो जो बाकी रह गया है वो अगली बार में कभी पूरा किया जाएगा।
      हां खिड़की वाली सीट का हिस्सा बस हो या रेल हर जगह पहले पहुंचने वाले यात्री कब्जा कर लेते हैं और करें भी क्यों नहीं बाहर के खूबसूरत नजारे जो देखने के लिए मिलते हैं। हां ये हर जगह होता है कि कुछ अपना सामान रखकर सीट आरक्षित कर लिया जाता है।
      हां उन चाचाजी ने कुछ देर की खामोशी के साथ बहुत ही प्यार और स्नेह से उस चुप्पी को तोड़ा था और पूरे रास्ते बात करते आए थे और इंदौर पहुंचकर मुझे अकेला देखकर अपने साथ चलने के लिए भी कहा था। एक दिन पहले सुमित जी और अब मुकेश जी की मेहमाननवाजी हम कभी नहीं भूल सकते, एक अनजान व्यक्ति को इतना प्यार, स्नेह, सम्मान मिला कि वो तो सदा ही याद रहेगा।

      ऐसा न कहें जी, पढ़ते आप हैं तो गलती कौन बताएंगे आप ही बताएं न। जो केवल सुंदर वर्णन लिख कर चले जाते हैं वो थोड़े ही गलती बताएंगे। हां 11 बजे देवास पहुंचे थे और इंदौर से तो चले ही थे, हमने उस गलती को सही कर दिया है। इस सुधारात्मक गलती के लिए क्षमा जैसे शब्दों की कोई आवश्यकता नहीं है, ये तो स्नेह है आपका। बहुत सारी शुभकामनाएं आपको।

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  6. Very nicely written. I lived the journey with you sir. I must say you were brave enough to fight with the ppl in the bus but I generally give a miss to such incident as I feel I'm on a journey to chill rather get agitated for such trivial issues. The love and the hospitality showered upon you by your host was indeed heart touching experience, God bless them. Keep writing. Enjoyed every bit

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    1. बहुत बहुत धन्याद जी। ब्लाॅग पर आने के लिए एक बार और धन्यवाद। हां थोड़ा बहुत ही उन सबसे बहस करना पड़ा फिर मुझे सीट मिल गई, अगर उतना नहीं करता तो मुझे वो सीट नहीं मिलती। खिड़की वाली सीट हो तो दिन में नजारों का लुत्फ और रात हो जाए तो खिड़की के सहारे सिर रखकर सोने का आनंद मिल जाता है। मुकेश भालसे जी और सुमित शर्मा जी की मेहमाननवाजी तो अतुलनीय रही इस यात्रा में।

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