Wednesday, May 16, 2018

मैं और मेरी साइकिल (Main aur Meri Cycle)

मैं और मेरी साइकिल (Main aur Meri Cycle)


साइकिल एक ऐसा शब्द है जो किसी के लिए बस, तो किसी के लिए ट्रक तो किसी के लिए खेल का सामान, तो किसी के लिए जीविका का साधन है, पर मेरे लिए साइकिल एक सपना था, जिसे पूरा करने के लिए बहुत इंतजार करना पड़ता था। चौथी कक्षा में पढ़ता था तभी से साइकिल के प्रति मेरा रुझान हो गया था। चौथी कक्षा में साइकिल वाला अध्याय पढ़कर मेरे मन में साइकिल चलाने के प्रति तो जुनून आरंभ हुआ वो बस मन में ही दबी रही, उसे मन के गहराइयों से बाहर निकलने के लिए चार साल तक इंतजार करना पड़ा। जब चौथी कक्षा में तो लोगों को साइकिल चलाते हुए देखता तो एक अजीब सी उत्सुकता मन में होती थी कि ये साइकिल तो खुद बिना स्टैंड के खड़ी नहीं होती पर जब चलती है तो कभी एक, कभी दो, कभी तीन और कभी-कभी तो दो आदमी और दो बोरा सामान भी अपने ऊपर लेकर चलती है।

जब भी कहीं साइकिल खड़ा देखता तो उसे छूता, उसे स्टैंड पर से उतारने का असफल प्रयास करता और कभी-कभी सफल भी हो जाता और वो सफलता महंगी भी पड़ती क्योंकि कभी साइकिल गिर जाती, तो कभी साइकिल का मालिक चिल्लाता, कोई कोई तो घर आकर शिकायत लगा जाता, पर आदत नहीं छूटती। ऐसे ही समय बीतता रहा और मैं पांचवी कक्षा में चला गया। गांव में स्कूल नहीं होने के कारण मैं पढ़ने के लिए अपने बुआ के गांव चला गया जो मेरे गांव से करीब छः-सात किलोमीटर दूर था। नई जगह, नए लोग, नए दोस्त और मैं दूसरे गांव का निवासी नए-नए लोगों के बीच जाकर कहीं दब सा गया था और अपने गांव की तरह वहां आजाद पंछी की तरह उड़ नहीं सकता था। धीरे धीरे समय बीतता गया और साइकिल के प्रति जो जुनून उत्पन्न हुआ था वो कहीं मन की गइराइयों में सिमट कर रहा गया।

लोगों को साइकिल चलाते हुए देखते देखते मैं आठवीं कक्षा में पहुंच गया। बुआ के छोटे बेटे की मैट्रिक की परीक्षा खत्म हुई थी और उसी उपलक्ष्य में उनको नई साइकिल दी गई थी। उस नई साइकिल को देखकर एक बार फिर से मेरे मन में साइकिल चलाने का जो कीड़ा सो गया था, जागने लगा और जागने क्या लगा पूरी तरह से जाग गया, लेकिन उस नई साइकिल को छूना मेरे वश की बात नहीं थी। जब भी उसे छूने की कोशिश करता भैया तुरंत मना कर देते कि गिर जाएगी, गंदी हो जाएगी, टूट जाएगी। उनकी इन बातों से निराश होकर हम भी उनकी साइकिल से दूर हट जाते।

ऐसी ही समय बीतता गया और साइकिल वाली यही बात बड़े भैया तक पहुंच गई। एक दिन ऐसे ही उन्होंने कहा कि छोटे ने नई साइकिल ले ली है तो हम भी एक पुरानी साइकिल लेकर घर में रख देंगे कभी-कभी चलाएंगे। अब राजदूत जैसी मोटरसाइकिल की सवारी करने वाला आदमी क्यों पुरानी साइकिल खरीदेंगे ये बात तब मेरी समझ में नहीं आया था, लेकिन समय के साथ बाद ये अहसास हुआ कि शायद वो साइकिल उन्होंने हमारे लिए ही लिया था। एक महीने बाद बड़े भैया कहीं से एक पुरानी सी खटारा साइकिल लाकर घर पर रख दिए। छोटे भैया का रिजल्ट निकला और वो अपनी काॅलेज की पढ़ाई करने गया (शहर का नाम) चले गए, कुछ दिन बाद बड़े भैया भी अपने राजदूत के साथ पटना प्रस्थान कर गए और जाते-जाते हिदायत दे गए कि साइकिल किसी को देना नहीं और समय-समय पर धो-पोंछ देना।

सबके चले जाने के बाद उस विमान (खटारा साइकिल) की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई। उसको धोना-पोंछना आदि काम करता पर उसे चला नहीं सकता था क्योंकि मुझे चलाना आता ही नहीं था। स्कूल से आने के बाद हर दिन का यही रूटीन था कि साइकिल को धो-पोंछ कर उसी जगह पर खड़ा कर देना। मेरे इस कार्य को देखकर पड़ोस के लोग यही कहते कि तुम इस साइकिल की इतनी सेवा करते हो तो सीख क्यों नहीं लेता। ऐसे ही एक दिन बुआ ने भी कह दिया कि अपने दोस्तों को बोल कि वो तुमको साइकिल सिखा देगा। बुआ की इतनी सी बात मेरे मन में एक नई ऊर्जा भर गया। अगले ही दिन मैंने स्कूल में अपने दो दोस्तों को साइकिल सिखाने के लिए राजी किया। बात ये तय हुई कि स्कूल से छुट्टी के बाद घर जाएंगे और जल्दी से साइकिल लेकर सड़क पर आकर चलाना सिखेंगे। 

अगले ही दिन की बात है। साढ़े तीन बजे स्कूल की छुट्टी हुई और हम जल्दी ही घर आए और चार बजते बजते हम तीनों ही साइकिल के साथ सड़क पर पहुंच गए। सड़क पर पहुंचकर उन दोनों ने पहले तो मुझे साइकिल पर बैठाया और दोनों ने साइकिल को पीछे से पकड़ लिया और मुझे पैडल मारने के बोला। अब मैं पैडल मारने की कोशिश करता तो पैदल घूमता ही नहीं। अब घूमे भी कैसे उन दोनों ने साइकिल को ऐसे पकड़ लिया था कि साइकिल आगे बढ़ नहीं पाए। जब मुझसे साइकिल आगे नहीं बढ़ी तो दोनों ने यही कहा कि लाओ मैं बताता हूं कि साइकिल कैसे चलेगी और उन दोनों में से एक साइकिल पर बैठा और चलाने लगा, साइकिल आगे बढ़ी तो दूसरा भी कुछ दूर दौड़ कर कैरियर पर बैठ गया और मैं उनका मुंह देखता रहा। वो मेरी साइकिल चलाते रहे और मैं पागलों की तरह उनके पीछे दौड़ता। घंटे पर साइकिल चलाने के बाद उनके तरफ से यही जवाब मिला कि अब तुमने देख लिया कि साइकिल कैसे चलती है। अब कल तुमको ऐसे ही चलाना पड़ेगा। मैंने कहा कल क्यों, आज क्यों नहीं, तो जवाब मिला कि हम दोनों अब थक गए हैं। उसके बाद मैं उदास मन से साइकिल के साथ घर आ गया।

अगले दिन भी यही कहानी। सड़क पर जाते ही उन्होंने कहा कि लाओ मैं थोड़ा बता देता हूं फिर तुम चलाना और आज भी दोनों साइकिल तब तक चलाते रहे जब कि साइकिल पंक्चर नहीं हो गई। पंक्चर होने के बाद उन्होंने कहा कि आज साइकिल बना लो तो कल सिखाएंगे। उस समय मेरे पास केवल एक रुपए ही था जिसमें से 65 पैसे मुझे पंक्चर बनाने के लग गए। उस समय दस मेरे 65 पैसे मेरे लिए 6500 रुपए के बराबर थे। उन 65 पैसों की बर्बादी ने मुझे सदमे में डाल दिया और मैंने साइकिल नहीं सिखने का फैसला किया। अच्छी बात ये रही कि अगले ही दिन स्कूल में मेरी दोस्ती दो नए लड़के (श्रवण और रंजीत) से हुई। मैंने उनको अपनी साइकिल वाली समस्या और उन दो बदमाश दोस्तों की करतूतों से अवगत कराया तो उन्होंने कहा कि तुम भी इस गांव के नहीं हो और हम दोनों भी इस गांव के नहीं है तो आज से हम तीनों की दोस्ती पक्की और जो कोई हमसे उलझेगा उसे ठोकेंगे, जो सामने आएगा उसे कूटेंगे और उनसे अपनी दोस्ती शुरू हो गई जो आज तक बनी हुई है।

छुट्टी के समय दोनों पुराने दोस्तों ने साइकिल के बारे में पूछा तो मैंने सीधा सा जवाब दिया कि मुझे तुमसे साइकिल नहीं सीखना क्योंकि मुझे नए दोस्त मिल गए हैं, और वही मुझे साइकिल सिखाएंगे। मेरी इस बात पर उनका कहना था कि अरे वो दूसरे गांव के हैं और उनमें से एक यहां अपने मामा के यहां रहने आया है और एक मौसी के यहां, तो हमने भी उनको कहा कि मैं कौन सा इस गांव का हूं मैं भी अपनी फूआ के यहां रहने आया हूं। इसलिए हम तीनों बाहर गांव के है हम तीनों दोस्त हैं और अब आज से ज्यादा बोलना नहीं वरना कुटाई भी करेंगे तीनों मिलकर और उसके बाद से उनसे कट्टी हो गई।

स्कूल में छुट्टी होने के बाद जल्दी से घर पहुंचा जल्दी-जल्दी खाना खाया तब तक श्रवण और रंजीत भी घर के पास आ गए। जल्दी से साइकिल निकाला और चल पड़े सपने की उड़ान भरने। मेरे लिए साइकिल चलाना या सीखना उस समय ठीक वैसा ही था जैसे मैं कोई पायलट हूं और विमान उड़ाना सिखने के लिए जा रहा हूं। कुछ ही मिनटों में हम तीनों दोस्त साइकिल के साथ सड़क पर थे। उन दोनों में से एक ने साइकिल को आगे से पकड़ा और दूसरा पीछे कैरियर को और मुझे साइकिल पर बैठने बोला। वो दोनों साइकिल के साथ-साथ साइकिल को पकड़ कर चलते रहे और मैं कभी आधा तो कभी पूरा पैडल मारकर अपने जहाज को उड़ाना सिखता रहा। यही प्रक्रिया करीब आठ-दस दिन तक चली और फिर आया रविवार। उस दिन हम सुबह जल्दी घर से साइकिल लेकर निकले और सड़क पर पहुंचे तो देखा कि दोनों दोस्त पहले से ही मेरा इंतजार कर रहे हैं।

मेरे वहां पहुंचते ही उनमें से एक ने कहा कि आज तुम्हारे साइकिल सीखने का अंतिम दिन है। आज हम दोनों मिलकर तुमको एक्सपर्ट बना देंगे। उनकी बातों से मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ, पर मुझे क्या पता कि ये दोनों आज मेरा हाथ-पैर तुड़वा कर एक्सपर्ट बनाएंगे। थोड़ी देर और दिनों की तरह पकड़कर साइकिल चलवाया और उसके बाद एक ने कहा कि अब दोनों मिलकर नहीं बारी-बारी से साइकिल सिखाएंगे और इतना कहकर रंजीत वहीं सड़क किनारे घास पर बैठ गया। मैं साइकिल की सीट पर बैठ कर पैडल मारने लगा और पीछे से श्रवण साइकिल को पकड़कर साथ चलने लगा। कुछ देर वो साथ चला और कब साइकिल को छोड़ दिया मुझे पता नहीं चला। करीब दो किलोमीटर चलकर मैंने आवाज लगाई कि श्रवण अब मुझे उतारो पर पीछे से कोई आवाज नहीं आई। मैने दो-तीन बार यही शब्द दुहराए पर कोई जवाब नहीं मिल रहा था। जवाब देता भी कौन, कोई साथ में था ही नहीं। मैंने हिम्मत करके पीछे नजर घुमाई तो देखा कि दोनों बहुत दूर हैं और खुद को अकेला पाकर मैं हड़बड़ाया और वहीं साइकिल समेत गिर गया। 

मैं नीचे और साइकिल मेरे ऊपर। चोट जोरों से लगी। अभी शाम भी नहीं हुई थी और चांद-तारे नजर आ गए। बाएं हाथ की कलाई में मोच आया और दर्द भी बहुत होने लगा था। सड़क पर बिखरे महीन-महीन गिट्टियों से सिर में भी कई जगह हल्की चोट लगी। उठने की कोशिश किया तो लगा कि पैर ही नहीं है मेरे पास। पैरों में कोई हलचल नहीं थी। पहले तो लगा कि पैर कटकर अलग हो गया है। मैंने हाथ से पैर को उठाने की कोशिश किया तो देखा कि पैर हिल ही नहीं रहा। मैं वहीं जोर-जोर से रोने लगा कि मेरा हाथ टूट गया, मेरा पैर कटकर अलग हो गया। अब मैं क्या करूंगा कैसे रहूंगा। इतने में एक आदमी वहां से साइकिल से गुजर रहा था जो बुआ के घर के पास का ही था। उसने मुझे उठाया तब तक दौड़ते हुए मेरे दोनों दोस्त भी आ गए। मेरी बातें सुनकर दोनों दोस्त और आदमी पहले तो खूब हंसे और फिर मुझे पकड़ कर कुछ दूर चलाया। मुझसे चला नहीं जा रहा था तो मेरे हाथ-पैर की उंगलियों को खींच-खींच कर दर्द कम करने की कोशिश करने लगा। कुछ देर में दर्द कम हुआ तो मैं धीरे-धीरे चलने लगा। आपस में यही समझौता हुआ कि घर में गिरने के बारे में कोई कुछ नहीं बताएगा पर वो जो एक आदमी था हम लोगों के घर पहुंचने के पहले ही घर पर सब कुछ बता चुका था। मेरा हाथ टूट गया, मेरे पैर नहीं हैं वाली बात से लोग वहां हंस रहे थे।

जैसे ही हम लोग घर पहुंचे बुआ ने पहले तो खूब गुस्सा किया और फिर गरम पानी से हाथ-पैरों की सिकाई गई तो दर्द आधा से ज्यादा कम हो गया। इतने में एक आदमी ने कहा कि अब तुम साइकिल सीख गए क्योंकि कोई भी वाहन खून मांगती है और तुम्हारी साइकिल ने तुम्हारा खून ले लिया इसलिए तुम एक्सपर्ट हो गए। ये तो रही मेरे साइकिल सीखने की बात और मेरे चोट लगने की बात। उसके बाद शुरू होता है मेरी प्यारी साइकिल की करुण कथा।

हम लोग रोज शाम को ऐसे ही साइकिल चलाते रहे और स्कूल भी साइकिल से ही जाने लगे। एक दिन शनिवार को स्कूल में प्लान बना कि कल इतवार है तो हम तीनों सुबह ही घर से निकलेंगे और दो घंटे में साइकिल से जहां तक जा सकते हैं वहां ता जाएंगे उसके बाद फिर वापस आ जाएंगे। अगले दिन सुबह जल्दी ही सात बजे के आस-पास हम घर से निकले और बड़े शान से अपने हवाई जहाज को उड़ाते हुए सड़क पर लैंड किया। वहां पंहुचा तो देखा तो जहाज पर सवार होने वाली दोनों सवारियां पहले से ही बोर्डिंग पास लेकर खड़ी है। एक ने कहा कि मैं आगे के डंडे पर बैठूंगा और दूसरे ने कहा कि मैं पीछे कैरियर पर बैठूंगा। 

मेरे जहाज पर दोनों सवारियों चल पड़ी, कुछ दूर चलने के बाद पायलट सवारी बन गया और सवारी पायलट और यही क्रम करीब ढाई घंटे तक चलता रहा। जब भी सामने से कोई गाड़ी आती दिखाई देती या पीछे से भी कोई गाड़ी आती तो हम तीनों साइकिल से उतरकर किनारे पर खड़े हो जाते और गाड़ी के चले जाने के बाद अपनी मंजिल की ओर बढ़ना आरंभ करते। बारी-बारी से हम तीनों साइकिल चलाते और एक आगे और एक पीछे बैठते। हम लोग दो घंटे कहकर घर से चले थे पर घड़ी तो थी नहीं जो कि समय देखते। चलते-चलते एक घड़ी वाला आदमी दिखा तो हमने समय पूछा तो उसने बताया कि साढ़े नौ बजने वाले हैं। साढ़े नौ का मतलब हम लोग ढाई घंटे दूर आ गए थे और अब यहीं से वापस हो जाना चाहिए। वहीं साइकिल रोककर कुछ देर बैठे और फिर वापस चल पड़े।

अब साइकिल चलाने की बारी श्रवण की थी। साइकिल की ड्राइविंग सीट पर श्रवण बैठ गया और मैं पीछे कैरियर पर बैठा तथा रंजीत आगे डंडे पर बैठ गया। कुछ दूर के बाद ड्राइवर की बदली हुई और मेरी बारी आ गई। अब मैं साइकिल चला रहा था, श्रवण आगे डंडे पर बैठा और रंजीत पीछे कैरियर पर। हम तीनों अपनी ही मौज में चले जा रहे थे। सहसा उस नागिन जैसी काली सड़क पर किसी की आहट सुनाई पड़ी। नजर उठा कर देखा तो सामने से एक जीप बल खाती हुई चली आ रही थी। जीप को सामने से आता देख हम तीनों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। इतना समय नहीं था कि हम साइकिल रोककर किनारे पर खड़े हो सके। चलती हुई साइकिल से जीप या किसी गाड़ी से साइड लेने का कोई अंदाजा नहीं था। अब हमारे पास एक ही उपाय था कि या तो जीप में साइकिल को ठोको और हाथ-पैर तुड़वाओ या फिर खेत में साइकिल को कूदाओ और रंगनी के कांटे अपने अपने शरीर में चुभनो दो। रंगनी एक प्रकार का छोटा पौधा है, जिस पर पीले-पीले फूल निकलते हैं और उसके पत्तों पर बहुत सारे कांटे होते हैं।

हाथ-पैर तुड़वाने से अच्छा तो यही था कि खेत में साइकिल को कूदा दो। और इससे भी पहले कि हम कुछ सोच पाते श्रवण जो कि आगे डंडे पर बैठा था उसने साइकिल की हैंडल को खेत की तरफ मोड़ दिया। हम तीनों को लेकर साइकिल बेपटरी हो गई और खेत में कूद गई। अब हुआ क्या, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा पर गिरा सब। हम तीनों कांटे के खेत में लुढ़क चुके थे। छोटे छोटे कांटे पूरे शरीर में चुभ गए थे। दर्द से हालत खराब हो चुकी थी। तीनों मिलकर एक दूसरे बुरा-भला कहते हुए उठे और सड़क पर आए। एक दूसरे का थोड़ा-थोड़ा दुख बांटने के बाद अब साइकिल को उठाने की बारी थी। हम तीनों साइकिल के पास गए और साइकिल की जो हालत हो चुकी थी उसके देखकर पैरों के नीचे से जमीन राजधानी एक्सप्रेस की तरह खिसकने लगी। वैसे उस समय राजधानी एक्सप्रेस के बारे में नहीं पता था न ही पैरों के नीचे से जमीन खिसकने की। साइकिल का अगला पहिया जिसमें कसा हुआ होता वह हैंडल के पास से ही टूट कर अलग हो गया था। साइकिल की हालत देखकर मैं वहीं रोने लगा तो दोनों ने मुझे हिम्मत बंधाया कि चिंता न करो, हम तुम्हारे दोस्त हैं, पैसे जमा करके साइकिल बनाएंगे। उन लोगों से मिले सहानुभूति के स्वर से थोड़ी हिम्मत आई और टूटी-फूटी साइकिल को खेत से उठाकर सड़क पर लाए। अब तक हम तीनों लोग जिस साइकिल पर सवार होकर आए थे अब वही साइकिल हम तीनों पर सवार होकर जाएगी। 

खैर जैसे भी हो हम तीनों मिलकर कैसे भी करके बारी-बारी से टांग कर साइकिल को गांव तक लाया। जितना रास्ता हमने साइकिल पर सवार होकर दो घंटे में पूरा किया था उतना ही रास्ता साइकिल हम लोगों पर सवार होकर पांच घंटे से ज्यादा लगा दिया। जैसे भी हो 4 बजे तक हम गांव पहुंच चुके थे। साइकिल मरम्मत की दुकान में गए तो नया सामान लगाने का 55 रुपया बताया। मैंने उसे कहा मेरे पास तो 55 पैसा भी नहीं है मैं 55 रुपए कहां से दूंगा। हम तीनों ने फिर यही फैसला किया कि पुराने सामान के बारे में पूछते हैं क्या पता मिल जाए तो पुराने सामान का भी उसने 12 रुपए बताया। 12 रुपए जमा करने के लिए भी हम तीनों को कम से कम महीना भर तो चाहिए ही था। अब उदास मन से साइकिल को इस प्रकार से डंडे के साथ बांधा कि घर में देखकर ये न लगे कि साइकिल घायल अवस्था में पड़ी हुई है। बांधकर साइकिल को घर ले जाकर लगा दिया और साइकिल बनाने का जुगाड़ करने लगे क्योंकि भैया के आने से पहले साइकिल बनना जरूरी था। एक-दो दिन सोचने में ही व्यर्थ हो गया कि कैसे इतने पैसे का इंतजाम हो और साइकिल बने।

वैसे ही एक दिन श्रवण ने कहा कि एक खण्ड (गांव के अंदर जो दीवार से घिरी हुई जगह होती है उसे खण्ड कहते हैं) में एक टूटी साइकिल पड़ी है जिसके न तो पहिए हैं न पैडल है। दो-चार सामान ही सलामत बचे हैं उसमें और उसमें वो सामान भी है जो हम लोगों को चाहिए। अब हम लोग उसे खोलने की जुगत लगा बैठे। खण्ड के मालिक से उसमें पिकनिक मनाने की इजाजत मांगने उन्होंने इजाजत इस शर्त पर दिया कि हम लोग अमरूद और अनार नहीं तोड़ेंगे। हम लोगों ने उनकी शर्त मान ली। ंअब उनको क्या बताते कि हमें आपके अमरूद और अनार तोड़ने के लिए आपके परमिशन की कोई जरूरत नहीं है वो तो जब चाहे दीवार फांदकर तोड़कर निकल लेंगे और आप कुछ नहीं कर पाएंगे। 

वो खटारा साइकिल पूरी तरह से जंग से आच्छादित थी और खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। हम लोग ने बहुत कोशिश किया पर असफल ही रहे। अगले दिन मिट्टी का तेल लेकर गए और उस पर डाल दिया फिर भी नहीं खुला और ऐसे ही करीब सात-आठ दिन के प्रयास के बाद हम लोग गढ़ लूटने में कामयाब हो गए और वह सामान हम लोगों के हाथ में था। हम लोग फिर घर से साइकिल लाए और सामान साइकिल बनाने वाले को दिया तो उसने दो रुपए की मांग किया तो हम तीनों ने मिलकर दो रुपए का इंतजाम किया और साइकिल बनवाने गए और बहुत कोशिशों से एक रुपए और चालीस पैसे में साइकिल बनवा लिया और बचे हुए 60 पैसे से हम लोगों ने जम कर पार्टी किया। अब तो इतने साल हो गए और अब तो न जाने हमारी वो साइकिल कितने जन्म ले चुकी होगी।

तो ये थी मेरी और मेरे साइकिल की करुण गाथा। उम्मीद है आपको अच्छा लगा होगा। अब जब आपने पढ़ ही लिया तो मेरे और मेरे साइकिल के प्रति कुछ सहानुभूति के शब्द कह दीजिए जिससे मेरी उस साइकिल के दिवंगत आत्मा को शांति मिले और मुझे हिम्मत।

जय भोलेनाथ।

मेरे फोटो के खजाने में साइकिल की कोई फोटो उपलब्ध नहीं थी तो भाई समान मित्र पंजाब के अनूपगढ़ निवासी हरजिंदर भाई ने बहुत ही प्रेमपूर्वक मुझे ये फोटो उपलब्ध कराया। फोटो के लिए हरजिंदर भाई का हार्दिक आभार।



बाघा बाॅर्डर के समीप स्थित राजाताल नामक गांव के पास खड़ा माइलस्टोन

18 comments:

  1. बहुत बढ़िया चित्रण

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    1. बहुत सारा धन्यवाद आपको

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  2. gudguda diya aapke lekh ne. aise kisse ham sabhi ki pitari me hain, lekin is lay me likhe nahin ja paate. bahut hi umda lekh.

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    1. आपको ढेर सारा धन्यवाद मैम। आपका मेरे ब्लाॅग पर आना ही बहुत बड़ी बात है, आपके कमेंट देखकर मेरा मन मयूर बिल्कुल झूम उठा।

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  3. रोचक वृत्तांत। साइकिल को जन्नत नसीब हुई होगी और वो उस जन्नत में मौजूद सड़कों पर बिना एक्सीडेंट और टूटने फूटने के डर के बेख़ौफ़ चली जा रही होगी मैं यही उम्मीद करता हूँ।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद विकास जी। वाह क्या बात कहा आपने साइकिल को जन्नत मिली और वहां वो बेखौफ सड़कों पर दौड़ रही होगी।

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  4. अथ साइकिल प्रेम गाथा सम्प्पन्न .......

    बढ़िया रहा आपका साईकिल विवरण और आपने हिम्मत भी खूब की ...

    सारे रोचक वर्णन आपकी ही जिन्दगी में हुए है क्या

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    1. बहुत सारा धन्यवाद आपको। साइकिल पुराणः संपन्नः भवति।
      वैसे ये तो हर किसी के साथ हुआ होगा, आपके साथ भी और दूसरे लोगों के साथ ही। सबका बचपन तो ऐसे ही गुजरा है।
      आप भी लिख दीजिए बड़ा सा साइकिल कथा, हमें इंतजार रहेगा।

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  5. Sinhaji, Jaishree recommended this article to me. Jindagi ki mashroofiyat mein, she helps me to read something really good which she comes across. Majja aa gaya. Ek baar padhne laga to chhoda hi nahi gaya. Woh bhi ek daur tha chhoti chhoti kushyein aur unn kushyein mein puri duniya kaa sama jana.

    It also reminded me that my neighbour has made an award winning documentary film on how the cycles gifted to women of several villages by an NGO or government changed their life. So this humble vehicle is still making a difference in life of many :-)

    Thanks again for sharing in such a flowing manner.

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    1. मनीष जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका यहां तक आने के लिए। जयश्री ने आपको मेरा ये लेख पढ़ने के लिए कहा ये मेरे लिए बहुत ही गर्वानुभूति की बात है, चाहे एक लेख के लिए उन्होंने आपको इसे पढ़ने के लिए कहा। वो दिन भी क्या दिन होते थे जब हम छोटे थे, किसी छोटी सी चीज को पाने के लिए कितना इंतजार करते थे, कितने आरजू मिन्नत के बाद जब वो चीज हासिल होती थी तो खुशियां सातवें आसमान के भी ऊपर पहुंच जाती थी। आप यहां तक आए मेरा लेख पढ़ा आपको खुशी मिले ये मेरे लिए बहुत ही खुशी की बात है। आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

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  6. एक साईकिल की सवारी स्कूल में पढ़ी दूसरी यहाँ।पहली के वक्त साईकिल चलाने की इच्छा होती थी।दूसरी के पढने के वक्त चलानी आती है पर साईकिल नहीं।पर पढ़ते पढ़ते साईकिल की सवारी आज पुनः हो गई और सच मे उतना ही मजा आया जब पहली बार आया था। मजा आ गया।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद यहां तक आने और पढ़ने और उसके बाद टिप्पणी करने के लिए। स्कूल वाली साइकिल की सवारी किसी लेखक की लिखी हुई थी तो रोचक होगी, पर मेरी कहानी तो बस अपने अनुभव को लिखा हुआ है आपको अच्छा लगा इसके लिए धन्यवाद। देर मत कीजिए इस बार साइकिल खरीद कर उससे बाबा के दर्शन कीजिए गुप्त धाम जाकर साइकिल से।

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  7. व्वा क्या बात है सरजी आपके साथ हमभी आज बचपन मे लोट के आ गए,
    ओ भी क्या दिन थे धन्यवाद सर जी याद दिलाने के लिए

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद वसंत भाई। बचपन के वो दिन भी कितने सुहाने होते थे, आज तो बचपन न जाने कहां खो गया आजकल के बच्चों का।

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  8. बहुत बढ़िया सर जी आपके इस लेख ने हमारे बचपन की याद ताजा कर दी। मैं भी बचपन में पापाजी से साइकिल दिलाने की जिद करता था मगर पापाजी हर बार मेरी बात टालते हुए कहते थे कि पहले पुरानी साइकिल से चलाना सीखो, नहीं तो नई साइकिल टूट जाएगी। घर में बड़ा होने के कारण कोई सिखाने वाला नहीं था। तो आपकी तरह हमें भी अपने मित्रों की मदद लेनी पड़ी। पुरानी साइकिल तो थी नहीं तो उस समय हमें 2 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से साइकिल किराए पर मिलती थी, बस ऐसे ही हमने भी साइकिल चलाना सीखा।
    धन्यवाद आपका सर जी हमारी पुरानी यादें ताजा कराने के लिए।

    और हाँ सलाम है आपकी साइकिल को जो खुद तो शहीद हो गई मगर आपको आपका विमान उड़ाना सिखा गई।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद अर्जुन जी। यहां तक आने और पढ़ने और कमेंट के लिए धन्यवाद। बचपन के दिन भी क्या दिन होते थे, न कोई चिंता न कोई फिकर बस अपनी ही मस्ती में उड़ते चले जाते थे। मन के आकाश में सपनों के पंखों से न जाने कहां तक उड़ते थे।

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  9. शानदार बचपन की यादें . ये साइकल के किस्से तो सबसे जुड़े हुई हैं .

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    1. बहुत सारा धन्यवाद सहगल साहब, ये बचपन की यादें तो हर किसी के जीवन से जुड़ी है।

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