पहाड़ : मेरा बालहठ

हुस्न पहाड़ों का ओ साहिबा हुस्न पहाड़ों का।
क्या कहना के बारहों महीने यहां मौसम जाड़ों का।
वैसे तो हम मैदानी इलाके के रहने वाले हैं पर फिर भी पहाड़ के दर्शन बचपन से ही करते आ रहे हैं। बरसात के दिनों में बरसात के बाद जब आसमान साफ होता था घर की छत पर से चारों तरफ पहाड़ के दर्शन होते थे। उन पहाड़ों को देखकर हम इतने खुश होते थे कि जैसे हमने पूरी दुनिया अपनी मुट्ठी में कर लिया हो। खुद पहाड़ देखना और घर के बड़े लोगों को जबरदस्ती पहाड़ दिखाना, जैसे मम्मी वो देखिए पहाड़ है, बड़ी मम्मी (ताई जी) एक पहाड़ उधर भी है। दादाजी को दिखाना कि दादाजी देखिए न कितने सारे पहाड़ हैं। अब आप कहेंगे कि मैदानी इलाके में पहाड़ कहां से आया? तो हमारा गांव भले ही मैदानी इलाके में था, पर पहाड़ चारों तरफ बहुत नजदीक में ही था। बरसात के बाद मौसम जैसे ही साफ होता तो हम सभी भाई घर की छत पर पहाड़ देखने पहुंच जाते। पूर्व दिशा में देखने पर दो तरफ पहाड़ दिखते जिसमें एक थोड़ी दूर होने पर कभी दिखता तो कभी नहीं दिखता था। वही दूसरी तरफ वाला पहाड़ बहुत आसानी से दिखाई देता था। पूर्व दिशा के पहाड़ों को देखने के बाद मन उब जाता तो हम पीछे मुड़कर पश्चिम की ओर नजर करते तो सबसे पहले बिहार शरीफ का पहाड़ दिखता जो दूर से ही चिढ़ाता हुआ नजर आता कि बच्चे दूर से क्या देखता है कभी पास आओ। हम भी मन में ही उसे जवाब देते कि थोड़ा बड़ा होने तो फिर देखना एक दिन तुम्हारे कंधे पर बैठकर सवारी करेंगे। उस पहाड़ से बातें करने के बाद बारी आती बहुत से पहाड़ों को एक साथ देखने की जो कि राजगीर में स्थित था। इन सभी पहाड़ों में राजगीर का पहाड़ ही सबसे साफ दिखाई पड़ता था। ऐसा नहीं कि उसकी दूरी कम थी। साफ दिखाई पड़ने की वजह उन पहाड़ों की ऊंचाई थी। सबसे ज्यादा हम उसी पहाड़ को देखते। ऐसे ही छत पर से पहाड़ों को देखते हुए बचपन बीतता जा रहा था।
बात उस समय की है जब हम चौथी कक्षा में पढ़ते थे। छत पर खड़े होकर पहाड़ देखते देखते अब जी भर चुका था और अब पहाड़ को नजदीक से देखने का और उसे छूने का तथा उस पर चढ़ने का मन करने लगा था। ऐसे ही हमने एक दिन हमने अपने बड़का बाबू (ताऊ जी) से कहा कि मुझे पहाड़ देखना है क्योंकि पता था कि किसी और से कहने से कोई फायदा तो है नहीं। मेरी बात का बड़का बाबू ने जवाब दिया कि बेटा छत पर जा और जी भर कर पहाड़ देख ले। मैंने भी उनको तुरंत जवाब दिया कि मुझे पहाड़ के पास जाकर पहाड़ देखना है, आप ले चलोगे मुझे दिखाने या मैं अकेले ही चल पड़ूं। मेरी बात का अर्थ उन्होंने समझ लिया कि ये जिद्दी लड़का जब पहाड़ को नजदीक से देखने के लिए सोच लिया तो अब इसे दिखा देने में ही भलाई है वरना किसी भी दिन ये निकल लेगा और सबको परेशानी में डाल देगा। उन्हांेने उसी समय कहा कि जिस दिन तुम भाइयों को स्कूल में छुट्टी होगी उस दिन ले जाकर सबको एक साथ पहाड़ दिखा दिया जाएगा।
हम सभी छुट्टी का इंतजार करने लगे। जल्दी की मनोकामना पूर्ण हुई और गुरुजी को बुखार लगा और गुरुपिंडा (पाठशाला) दो-तीन के लिए बंद हो गया। अब गुरुजी का बीमार पड़ना मेरे लिए खुशखबरी के रूप में आया और घर आकर बताया कि कल हम पहाड़ देखने जाएंगे। घर में लोग पूछने लगे कि ऐसा क्या हो गया जो तुम कल पहाड़ देखने जाआगे और कौन जा रहा है जिसके साथ जाआगे, तो मैंने घर में पुरानी बातें याद दिलाया कि बड़का बाबू ने ही तो कहा था कि जब स्कूल की छुट्टियां होगी तो पहाड़ देखने चले जाना और गुरुजी बीमार हो गए हैं और स्कूल की छुट्टी हो गई। सारी बातें बड़का बाबू को पता लगी तो उन्होंने पिताजी को उसी समय आदेश दिया कि कल इन बच्चों को पार्वती गांव (पिता का ननिहाल जिस गांव में था उस गांव का नाम पार्वती था) ले जाओ और पहाड़ दिखा कर लाओ और ध्यान रखना कि ये बदमाश लोग ईधर-उधर न भागें खासकर ये (मैं)। उसके बाद उन्होंने हम लोगों को कहा कि अब जाओ तुम सब आज खेलो और कल पहाड़ देखने चले जाना। हम भी घर से बाहर निकले और गली में जितने लोग मिलते, बच्चे से लेकर बड़े तक सबको ये बताते चल रहे थे कि हम कल पहाड़ देखने जाएंगे और जब गली में लोग दिखने बंद हुए तो घर-घर जाकर सबको बताने लगे कि हम सभी भाई कल पहाड़ देखने जाएंगे। आज कल के नेता जितने चुनाव जीतने के बाद खुश नहीं होते थे उससे ज्यादा तो हम पहाड़ देखने के नाम पर खुश हुए।
कल सुबह जाने की खुशी में पूरी रात नींद नहीं आई। हर आधे घंटे बाद मां से पूछते कि मम्मी सुबह होने में अब कितना समय है। जवाब मिलता कि बस थोड़ी देर में सुबह हो जाएगा अभी सो जाओ। मैं कुछ देर के लिए चुप हो जाता और थोड़ी देर बाद फिर से वही सवाल और मां का वही जवाब। पूरी रात न तो मैं सोया और न ही किसी और को सोने दिया। खैर जैसे तैसे रात गुजरी और सुबह हुई। जल्दी जल्दी नहा धोकर तैयार हुए और चल दिए पिता के मामा के घर पहाड़ देखने। पहले 4 किलोमीटर पैदल चलने के बाद बस से जाना था। अब तक कहीं ऐसे जाने की बारी आए तो रिक्शा या टमटम जरूर चाहिए होता था पर आज कदम ऐसे बढ़े चले जा रहे थे जैसे कि हम वो हैं ही नहीं जो कल तक थे। चार किलोमीटर का पैदल का सफर कब दौड़ कर पूरा कर लिया पता भी नहीं चला। पैदल सफर के बाद बारी आई बस की। बस के इंतजार में करीब आधा घंटा खड़ा रहा तो बस आई। बस पूरी तरह से भरी हुई थी, कहीं भी पैर रखने की जगह तक नहीं थी। खैर कैसे भी करके कंडक्टर ने बस में चढ़ाया और और एक-दो लोगों को उठाकर हमें सीट प्रदान किया। उसके बाद कंडक्टर ने पिताजी से पूछा कि इन सबको लेकर आज कहां जा रहे हैं। पिताजी ने कहा कि इनसे ही पूछ लो क्योंकि ये ही बता पाएंगे कि ये कहां जा रहे हैं। अब कंडक्टर ने पूछा कि किधर को चले बाबू? हम भी झट बोल पड़े पहाड़ देखने। अब उसने डरा दिया कि पहाड़ तो कल ही अपने मामा के घर गया। मैंने कहा चल हट, आज सुबह ही छत से देखकर आया हूं पहाड़ वहीं है।
मन बिल्कुल उत्साह से भरा हुआ था। करीब एक घंटे के सफर के बाद हम वहां पहुंच गए जहां पहाड़ देखना था। बस से उतरते ही पहाड़ दिख गया। इतने नजदीक से पहाड़ को देखकर जो खुशी हुई कि पूछिए मत कुछ कह नहीं सकते उसके बारे में। सबसे पहले हम पिताजी के ननिहाल गए। सब लोगों से मिलने के बाद कुछ खाने-पकाने की तैयारी होने लगी। सब अपने अपने काम में व्यस्त और मेरा चंचल मन कहीं और व्यस्त। मौका देखकर भाइयों को भी न पूछ अकेले ही पहाड़ की ओर दौड़ लगा दिया। पांच मिनट भी नहीं लगे और हम पहाड़ के पास। पहले उसे छूकर देखा, उसे कुरेदा पर कोई हलचल नहीं। अब मेरा मन पहाड़ के ऊपर जाने का हुआ। बहुत ईधर-उधर देखा पर कोई सीढ़ी नहीं दिखी जिससे कि पहाड़ पर चढ़ा जा सके।
हम सीढि़यों की खोज में आगे बढ़ने लगा। कुछ ही आगे बढ़े थे कि एक कुक्कुर महाराज पहाड़ से नीचे आते दिख गए। उसे नीचे उतरता देख हमने समझ लिया कि वहीं से ऊपर जाने के लिए सीढि़यां होगी। वहां जाकर देखा तो कोई सीढ़ी नहीं थी बस ऊबड़-खाबड़ रास्ते थे। हमने भी उसी रास्ते से ही ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया और करीब आधा घंटा (अंदाज से) चलने के बाद हम अकेले ऊपर पहुंच गए। ऊपर कोई भी नहीं था, केवल दो-तीन मोटे-मोटे कुत्ते थे जो टहल रहे थे। डर भी लग रहा था कि कहीं काट न ले। पर शायद कुत्ते से जितना हम डर रहे थे, कुत्ते भी मुझसे उतना ही डर रहे थे, इसलिए वो हमसे दूर हटते रहे। पहाड़ के ऊपर पहुंचकर हमने तो पूरी दुनिया पर कब्जा ही कर लिया था। यहां कोई आवाज नहीं, कोई डांटने वाला नहीं, कोई कुछ कह नहीं रहा था, बस हवा की सांय सांय की आवाज आ रही थी।
हम अकेले ही वहां उधम मचाने में व्यस्त हो गए। हम वहां अकेले ही खेलने में व्यस्त थे और ईधर घर में खोजबीन जारी हो चुकी थी। ये तो अच्छा हुआ उस गांव के ही एक आदमी को जिसने हमें ऊपर जाते देख लिया था और उसने घर पर जाकर बोल दिया कि आपके यहां जितने बच्चे आए हैं उनमें से एक पहाड़ के ऊपर चला गया है। उससे बातों का पता चलते ही सब लोग हमें खोजने पहाड़ पर पहुंच गए। हम अकेले ही खुशी में ईधर-उधर घूम ही रहे थे, पत्थरों का उठाकर फेंक रहे थे तभी अचानक ही पिताजी कई और लोगों के साथ आते हुए दिखाई दिए। पास पहुंचते ही बातों की बरसात शुरू हो गई। शुक्र है वहां के चाचा लोगों का कि पिटाई से बच गए।
सबने हमें पकड़ कर नीचे उतारा और घर वापस ले गए। उसके बाद एक आदमी मेरे साथ लगा दिया गया कि ये जहां जाए इसके साथ जाना है। अकेले छोड़ना नहीं है वरना ये कहीं भी जा सकता है। पूरे दिन हम पहाड़ का चक्कर काटते काटते रहे और वो आदमी जो मेरा रक्षक बनकर मेरे साथ-साथ घूम रहा था अपने बाल नोंच रहा था और पिताजी के मामा का नाम लेकर बार बार बोल रहा था कि फलाना बाबू हमको सौ बार पहाड़ पर चढ़ने उतरने कह देते वो अच्छा था पर इन्होंने कहां मुझे फंसा दिया है। ऐसे बालक के साथ लगा दिया है कि मैं परेशान हो गया हूं। इतना तो पूरे दिन खेत में काम करके भी मैं नहीं थकता था जितना इस बच्चे ने मुझे थका दिया। हम भी पूरे दिन चक्कर काटते काटते जब थक गए तो शाम होने से पहले ही घर पर आकर पसर गए और बिना खाए पिये सो गए और अगले दिन वापस अपने गांव चले गए। वहां पिताजी से वहां के चाचा लोगों ने बचाया और घर में बड़ी मम्मी और बड़का बाबू ने मम्मी से बचाया, वरना तो आप समझ ही रहे होंगे न क्या होता।
पहाड़ का दूसरा दर्शन हमने राजगीर के मलमास मेले में किया। जब पूरा परिवार एक साथ मलमास मेला घूमने गए थे। वहां भी हमने अपनी शरारत नहीं छोड़ा और सब जब नहाने गए तो हमने भीड़ का फायदा उठाया और चल दिया गृद्धकूट पर्वत की चढ़ाई करने। ईधर हम पहाड़ चढ़ने में मस्त थे और उधर पूरा परिवार मेला घूमने के बजाय मुझे खोजने में पस्त थे। खैर जैसे ही लाउडस्पीकर से घोषणा हुई कि फलाने गांव का फलाना बच्चा खो गया है और उसकी मां का रो-रोकर बुरा हाल है तो मां के रोने के बारे में सुन कर हमने एक मिनट की भी देरी किए बिना जहां हम सब रुके थे वहां पहुंच गए। वहां जाकर पता चला कि सब लोग अलग-अलग दिशाओं में मुझे खोजने के लिए निकले हुए हैं और कुछ लोग यहीं बैठे हैं कि आते ही उसे बांधा जाए। खैर कुछ देर में यहां भी स्थिति सामान्य हो गई और सब लोगों के साथ होने के कारण यहां भी बरसात (लात-घूंसे की) से बच गया।
इतना होने के बाद भी पहाड़ का रोमांच कम नहीं हुआ। पहाड़ का नाम सुनते ही मन में ऐसी लहर दौड़ती कि लगता बस जल्दी से पहुंच जाएं। उसके बाद हमारे छोटे दादा ने बर्फ से ढंके पहाड़ के बारे में बताया तो यह रोमांच और जोर मारने लगा और जल्दी से उन बर्फ से लदे पहाड़ों को देखने के लिए निकल जाने को आतुर होने लगा। दो साल तक पैसे जमा करने के बाद एक बार फिर हमने अपनी शरारत दुहराई और बिना बताए बर्फ से ढंके पहाड़ देखने निकल पड़ा। सात दिन तक ईधर-उधर भटकता रहा पर निराशा ही हाथ लगी और बर्फ से ढंके पहाड़ तो दूर की कौड़ी, बिना बर्फ वाला पहाड़ भी न दिखा। इतना कुछ होने के बाद भी पहाड़ का रोमांच मेरे जीवन से कम नहीं हुआ और बढ़ता ही रहा। जब भी मौका मिलता राजगीर या बिहार शरीफ की पहाडि़यों की चढ़ाई कर आता। स्कूल से लेकर काॅलेज के दिनों तक भी पहाड़ से मेरा प्रेम जगजाहिर रहा और जब भी मौका मिलता पहाड़ से गले मिलने निकल जाते। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदली और पारिवारिक जिम्मेदारी सिर पर आ गई लेकिन पहाड़ का रोमांच बना रहा।
एक बार फिर समय आया और इस बार पहाड़ नहीं बर्फ से ढंके पहाड़ देखने के लिए निकलना था। वह समय था हमारी केदारनाथ और बदरीनाथ की यात्रा का। वैसे तो इस पूरी यात्रा में पहाड़ों का साथ हर पल रहा। छाया भी अंधेरे में साथ छोड़ देती है पर इस यात्रा में पहाड़ों ने एक पल के भी हमारा साथ नहीं छोड़ा। आगे-पीछे, दाएं बाएं जिधर भी नजर करते उधर बस पहाड़ ही पहाड़ दिखते थे। इतने सारे पहाड़ देखकर मन हिरण की तरह कुलांचे मार रहा था। सफर चलता रहा और केवल पहाड़ अब बर्फ से ढंके पहाड़ में तब्दील हो चुका था। पहली बार दूर से बर्फ से ढंके पहाड़ देखते ही हम इतने रोमांचित हो रहे थे कि पास में बैठे बेटे को उन पहाड़ों को दिखा रहे थे। अब इस दृश्य से मेरा बचपन फिर से याद आ गया। जब हम छोटे थे अपने बड़ों को पहाड़ दिखाते थे और आज जब हम खुद बड़े हैं तो छोटे को पहाड़ दिखा रहे हैं। अब एक संयोग भी देखिए कि कितना प्यार संयोग बना इस यात्रा में। जब हम छोटे थे तो अपने पिताजी के साथ पहाड़ देखने गए थे और आज स्थितियां ये है कि जब हमें पहली बार बर्फ से ढंके पहाड़ देखने का अवसर मिला तो मेरे साथ मेरे पिताजी भी हैं और मेरा बेटा भी है। इसे ही कहते हैं जुनून की उम्र के चाहे कितने भी पड़ाव आप गुजार दें पर जिस जिस का आकर्षण, जुनून और पागलपन आप पर हावी रहता है वो आखिर तक साथ ही रहता है। इस यात्रा में हमें बर्फ से ढंके पहाड़ भी देखने का अवसर मिल गया। उसके बाद बर्फ से ढंके पहाड़ों से इतना प्यार हो गया कि बार-बार उधर ही झोला लेकर दौड़ पड़ते हैं। मौसम और दिन, समय और परिस्थितियां चाहे कुछ भी हो, पहाड़ से गले लगने का मौका जब भी हमें मिलेगा हम बिना देर किए पहाड़ के गले लग जाएंगे। जीवन में भले ही कितनी दुश्वारियां आएं पर पहाड़ से अपना ये रिश्ता जब जब निभ सकता है निभाता रहूंगा। ये तो रही पहाड़ की बात। पहाड़ के बाद अगर किसी चीज ने मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया है वो है समुद्र और नदी जिसके बारे में फिर कभी बात करेंगे।
उम्मीद करता है पहाड़ से हमारी मुलाकात आपको पसंद आई होगी। इसे पढ़कर आपने जो भी अच्छा या बुरा महसूस किया है जरूर बताइएगा। कुछ कमियों की तरफ भी आप मेरा ध्यान आकर्षित वैसे ही कराइएगा जैसे पहाड़ मुझे आकर्षित करता है।
धन्यवाद।
आपका अभ्यानन्द सिन्हा
वाह, बेहद खूब सिन्हा साहिब...आपकी लेखनी में निखार आता जा रहा है।
ReplyDeleteआप जैसे लोगों का मेरे ब्लाॅग पोस्ट पर आना ही मेरे अंदर एक नई ऊर्जा प्रदान करता है, जितना धन्यवाद करूं उतना कम है।
Deleteबहुत बढ़िया सर जी...
ReplyDeleteबचपन के दिन होते ही बड़े सुहाने है जितनी मर्जी शरारत कर लो उछलकूद कर लो उसके बाद तो जहां बड़े हुए तो घर और बाहर की जिम्मेदारी सर पर आ जाती है फिर तो बस बचपन के दिनों की याद रह जाती है वैसे ऐसा बचपन में सभी के साथ होता है कि हम चाहे जैसी भी शरारत कर ले मगर घर में कोई ना कोई हमें बडे लोगों की मार से बचा ही लेता है
मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आपके बचपन की जो भी इच्छा हो सारी पूरी हो।
बहुत बहुत धन्यवाद जी।
Deleteबचपन के दिन होते ही है ऐसे हैं कि जितनी भी शरारत करो सब माफ। आज हम अपनी जिम्मेदारियों निभा रहे हैं और बच्चे शरारत कर रहे हैं, परिवर्तन संसार का नियम है आज के बच्चे कल बड़े बन जाएंगे। आपको भी बहुत बहुत शुभकामनाएं जी, आपकी भी हर इच्छा पूरी हो, जीवन खुशियों से भरा रहे।
बहुत बढ़िया रहा आपका पहाड़ प्रेम और आप भी अजब हो..... और अपनी ही गजब कहानी लिखते हो
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद भाई जी। हां बचपन की उन यादों को लिखा है, ये तो सबकी कहानी है।
DeleteThanks
ReplyDeleteएक ही साँस में पढ़ गया आपका "मेरा बालहठ"...बचपन की बातों को इतने विस्तार से शब्दों में पिरोना...
ReplyDeleteलेख की ये पक्ति "जब हम छोटे थे तो अपने पिताजी के साथ पहाड़ देखने गए थे और आज स्थितियां ये है कि जब हमें पहली बार बर्फ से ढंके पहाड़ देखने का अवसर मिला तो मेरे साथ मेरे पिताजी भी हैं और मेरा बेटा भी है।" दिल को छू गया...By the way उपरोक्त गाने की पंक्तियाँ राम तेरी गंगा मैली फिल्म की हैं...
बहुत सारा धन्यवाद सर जी आपको। आपने शब्द दर शब्द मेरे लेख को पढ़ा और इतनी सुंदर टिप्पणी से आपने इस लेख का मान बढ़ाया बहुत अच्छा लगा। अपनी बचपन की यादों पर हमने बहुत सारे लेख लिखे हैं। जब समय मिलता है तो हम खुद ही इन लेखों को पढ़कर फिर से अपने बचपन में पहुंच जाते हैं।
DeleteSir ji,aapka blog subah subah padha,aaj sunday ki suruaat jabardast hui.Bahut badhiya likha hai aapne.
ReplyDeleteबहुत सारा धन्यवाद आपको अज्ञात मित्र जी। अपना कीमती समय देकर लेख को पढ़ने और सुंदर टिप्पणी से लेख की शोभा बढ़ाने के लिए आपको ढेर सारा धन्यवाद।
Deleteवाह आप राहुल सांकृत्यायन की तरह अच्छे लेखक भी हैं सिन्हा साहब
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद सच्चिदानंद जी। हम तो बस लिखते हैं, अच्छा होने का फैसला तो आप सब ही करेंगे और आपने इतने महान व्यक्तित्व से हमारी तुलना कर दिया, न न जी ऐसा न करें।
Deleteपहाड के प्रति आपके अपार स्नेह व समर्पंण को नमन करता हुं सर ओर जिस तरह आपने अपनी कलम से चुन चुन कर शब्दों की अनमोल मोतियों की माला से पहाड का श्रृंगार किया पाठकों को पहाड की ओर आकर्षित करती है आप जैसे घुमक्कडी लेखकों की वजह से ही पहाडों का अस्तित्व बचा हुवा है जो हिमालय प्रेमियों को हिमालय से दुर हिमालय प्रेम सिखाती है
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद सुदेश जी, आपको मेरा लेख अच्छा लगा इससे ज्यादा और मुझे क्या चाहिए। हिमालय प्रेम को आपसे ज्यादा और कौन समझ सकता है जिनके हर शब्द में हिमालय का वास हो। हम तो कभी कभी हिमालय की तरफ जाते हैं पर आप तो हिमालय के वासी हो। आपका हिमालय और मेरे प्रति प्रेम ऐसे ही बना रहे।
Delete"मेरा बालहठ"आपकी लेखनी का कोई जवाब ही नहीं.......आप जिस तरह से प्रकृति पहाड़ उत्सुकता आदि आदि आप स्नेह से इन सब का वर्णन करते है ऐसा लगता है हम भी कहीं न कहीं आप ही के साथ उन सब दृश्यों का आनन्द ले रहे हैं ....गज़ब दिल का प्रेम है कुदरत से
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद मिश्रा जी। ये तो आपका स्नेह है कि आपको मेरा लिखा अच्छा लगता है और आप सबकी इन तारीफों के कारण ही कुछ लिखने के लिए उत्साहित होता हूं।
Deleteअब में क्या कहूँ। ऐसा लगा जैसे आप समक्ष अपनी कहानी सुना रहे है। बहुत मज़ा आया पढ़ के। जब पिताजी की पोस्टिंग बिहार शरीफ में हुई थी तब एक बार नालंदा और राजगीर गया था। यादें अब धुंदली हो चुकी है लेकिन पहाड़ तो आज भी याद है। जब याद आती तो देवानंद साहब और हेमा मालिनी जी की वो गीत "फिर भी वादा तो निभाया, ओ मेरे राजा" देख लेता हूँ।
ReplyDeleteपहले तो बहुत सारा मधुर मधुर धन्यवाद आपको। आपको मेरा लिखा पढ़कर अच्छा लगा इससे ज्यादा और मुझे क्या चाहिए। वैसे आप अभी कहां रहते हैं, हम भी अभी फिलहाल दिल्ली में रहते हैं। राजगीर की खूबसूरत वादियां बरसात में ऐसे खिल जाती है जैसे सुबह सुबह गेंदा का फूल। एक बार पुनः धन्यवाद आपका।
Deleteपिछले कुछ सालों से तो दिल्ली में ही हूँ, जन्म से देवघऱ का हूँ।
Deleteबहुत बढि़या जी, हम भी दिल्ली में ही हैं
Deleteदिल्ली में किस तरफ, मैं तो मयूर विहार फेज 3 में रहता है
Deleteअगर हो पाया तो आपसे मुलाकात जरूर करेंगे
Deleteआपके पास ही रहते हैं ज्यादा दूर नहीं, पांडव नगर, गणेश नगर मदर डेयरी के पास
Deleteजब कभी ईधर से गुजरना हो तो याद कर लीजिएगा
Delete