घुमक्कड़ जीवन की अभिलाषा (Dream of a Traveller)
दिल आवारगी में मस्त और बहकते कदम।
कोई ठिकाना भी न होे, कहीं ठहरना भी न हो
अनजान उन राहों पर कहीं रुकना भी न हो।
न समय पहरेदार हो, न कोई सरहद ही पास हो
बस अगर कुछ हो तो उनसे मिलने की प्यास हो।
कैमरे में हर लम्हा कैद करते हुए चलूं
जो भी मिले सबको दामन में समेटते चलूं।
मंजिल दिखे तो बस जल्दी से दौड़ लगाऊं।
रास्ते पुकारे तो बस वहीं पर रुक जाऊं।
शुरुआत हो उस सफर की, पर अंत न हो कहीं
आसामन मेरा हो और मेरी ही हो पूरी जमीं।

आपकी ये कविता पढ़कर आज़ादी का एहसास आता है। आपने बंजारे जैसे जीवन की जो तस्वीर खींची, वो बहुत खुली और सच्ची लगती है। मुझे यह बात खास लगी कि आप मंजिल से ज्यादा सफर को जीना चाहते हो।
ReplyDelete